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बिहार चुनाव की तैयारी के बीच चुनाव आयोग के SIR 2025 दावे पर सुप्रीम कोर्ट में घमासान — पारदर्शिता पर गंभीर सवाल

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नई दिल्ली 6 नवंबर 2025

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है, वैसे-वैसे मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी और उसकी समीक्षा प्रक्रिया को लेकर विवाद तेज होता जा रहा है। चुनाव आयोग (ECI) यह दावा कर रहा है कि बिहार में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR 2025) वर्ष 2003 की पारदर्शी और मानक प्रक्रिया पर आधारित है। लेकिन इस दावे को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इस बार की संशोधन प्रक्रिया में पारदर्शिता तो दूर, बड़े पैमाने पर नागरिकों के मताधिकार को खत्म करने का खतरा पैदा हो गया है।

याचिकाकर्ताओं और नागरिक अधिकार संगठनों का कहना है कि 2003 की प्रक्रिया और 2025 के SIR में जमीन-आसमान का फर्क है। जहां 2003 में सिर्फ सूचनाओं के अपडेट और नियमित सुधार पर जोर था, वहीं इस बार नागरिकता की दोबारा पुष्टि और कठोर दस्तावेज़ी जांच को अनिवार्य बना दिया गया है। कई ऐसे नागरिक — खासकर ग्रामीण और गरीब पृष्ठभूमि वाले — जिन्हें हर जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं, उन्हें आसानी से सूची से हटाने की आशंका जताई जा रही है। यह स्थिति सीधे-सीधे वोटर दमन (Voter Suppression) की ओर इशारा करती है।

चुनाव आयोग हालांकि अपने बचाव में कह रहा है कि यह प्रक्रिया जनसंख्या में बदलाव, नागरिकों के पलायन और पुरानी मतदाता सूचियों को सुधारने के लिए जरूरी है। आयोग का दावा है कि यह पूरी तरह कानूनी, पारदर्शी और समावेशी प्रक्रिया है। लेकिन याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि अब तक लाखों नाम सूची से हटाए गए हैं, नए वोटरों का सही ढंग से पंजीकरण नहीं हो रहा और तकनीकी खामियों के कारण लाखों असल मतदाता चुनाव से बाहर हो सकते हैं। उनका कहना है कि इससे चुनाव परिणाम प्रभावित हो सकते हैं, जो लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग को हटाए गए मतदाताओं की पूरी सूची सार्वजनिक करने और हटाने के कारणों का ब्यौरा देने के निर्देश दिए हैं। साथ ही कोर्ट ने साफ कहा कि नई प्रक्रिया में समावेशन (Inclusion) सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए, न कि बहिष्कार। जिन नागरिकों के पास आधार, वोटर आईडी, राशन कार्ड जैसे आम दस्तावेज़ मौजूद हैं, उन्हें मताधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

यह पूरा विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बिहार का चुनाव सिर्फ एक राज्य का चुनाव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक संकेतक माना जाता है। इसलिए मतदाता सूची में ज़रा-सी भी गड़बड़ी कई सीटों के नतीजे बदल सकती है। और अगर चुनाव ऐसे विवादित मतदाता सूचियों के आधार पर होगा तो उसकी वैधता और विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे।

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