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उत्तर प्रदेश : 10 साल की नौकरी और 100 करोड़ की काली कमाई, DSP ऋषिकांत शुक्ला सस्पेंड

कानपुर/लखनऊ 4 नवंबर 2025

उत्तर प्रदेश पुलिस की वर्दी पर एक और बड़ा धब्बा उजागर हो गया है। कानपुर शहर को अपनी निजी जागीर समझने वाले डिप्टी एसपी (PPS) ऋषिकांत शुक्ला की गिरफ्त आखिरकार हो गई है। लंबे समय तक कानून की रक्षा का दावा करने वाले इस अधिकारी ने खुद कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए अपने पद का घिनौना दुरुपयोग किया और भ्रष्टाचार की दौड़ में पुलिस प्रणाली की जड़ें खोखली कर दीं। SIT की जांच में सामने आया कि शुक्ला ने लगभग एक दशक में कानपुर में करीब ₹100 करोड़ की अवैध संपत्ति इकट्ठा की, जो किसी भी सरकारी अधिकारी की वैध आय से हजारों प्रतिशत ज्यादा और बेशर्म भ्रष्टाचार का बेहद खतरनाक नमूना है। अधिकारी के नाम पर नहीं, बल्कि कई संपत्तियाँ परिवार और अन्य सहयोगियों के नाम पर खड़ी की गईं, ताकि यह साम्राज्य पुलिस महकमे की नज़रों से बचा रहे। परंतु आखिरकार इनकी असलियत और खेल खुल चुका है।

शुरुआत में उम्मीदों, जनसेवा और ईमानदारी के नाम पर पुलिस उपनिरीक्षक के रूप में 1998 में भर्ती हुए ऋषिकांत शुक्ला ने अपनी करियर चढ़ाई का असली शॉर्टकट तभी चुन लिया था — रिश्वत, सेटिंग, दलालों से दोस्ती और अपराधियों से गठजोड़। कानपुर जैसे बड़े और चुनौतीपूर्ण जिले में तैनाती उनके लिए जनता की सुरक्षा नहीं बल्कि पैसा कमाने की सुनहरी खदान बन गई। शुक्ला ने कुख्यात और विवादित वकील अखिलेश दुबे के बेहद करीब होते हुए जमीन कब्जा, विवाद सुलझाने के नाम पर उगाही और बड़े व्यापारियों से वसूली की समानांतर व्यवस्था खड़ी कर ली थी। SIT में यह खुलासा हुआ कि 12 महँगी जमीनें, 11 कमर्शियल दुकानें, आलीशान मकानों की पूरी कतार, बाजार क्षेत्रों में कब्जाई गई अरबों की लोकेशन और करोड़ों का काला कैश — यह सब सिर्फ कानपुर में अर्जित किया गया। यह अवैध नेटवर्क इतना मजबूत हो चुका था कि शुक्ला खुद को एक ऐसे ‘अनौपचारिक डॉन’ के रूप में स्थापित कर चुके थे, जिसे न कानून का डर था और न ही विभागीय निगरानी का।

जब कानपुर में उनकी मनमानी और वर्चस्व बढ़ता गया, तब उनके रसूख का दबाव इतना था कि विभाग में भी कोई खुलकर आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं कर पाता था। आम जनता शिकायत करने से डरती थी क्योंकि शिकायतकर्ता को ही अपराधी बना देने का खेल चलता था। सफेदपोश नेटवर्क इतना गहरा था कि शुक्ला का नाम आते ही थानेदार, चौकी इंचार्ज, दलाल और दलालों के मुखिया सबकी रगें ढीली हो जाती थीं। यहाँ तक की कानपुर पुलिस के भीतर भी दबे स्वर में उन्हें “वर्दी वाला सिंडिकेट” कहा जाने लगा था। उनके ‘साम्राज्य’ की सुरक्षा करने वालों की सूची लंबी बताई जाती है, और जितनी गहराई से जांच आगे बढ़ेगी, उतनी ही चौंकाने वाली परतें खुलेंगी। लोगों का कहना है — “कानपुर में किसी की जमीन, दुकान या कारोबार सुरक्षित रहे, यह ऋषिकांत शुक्ला की इच्छा पर निर्भर करता था।”

सिस्टम तब जागा जब SIT ने अपनी रिपोर्ट में कड़े शब्दों में लिखा कि यह अधिकारी अपने पद से अधिक प्रभाव और अधिक धन संपत्ति का अवैध उपयोग कर रहा है। इस रिपोर्ट के आधार पर अतिरिक्त डीजी (प्रशासन) ने तुरंत कार्रवाई की संस्तुति की, जिसे DGP और गृह विभाग ने मंजूरी देते हुए DSP ऋषिकांत शुक्ला को तत्काल प्रभाव से निलंबित करने का आदेश जारी कर दिया। आदेश में साफ लिखा है कि अब विजिलेंस विभाग द्वारा उन सभी संपत्तियों, बैंक खातों, बाजार स्रोतों और उनके रिश्तेदारों की आय का फोरेंसिक हिसाब लगाया जाएगा। यदि आरोप सिद्ध होते हैं — इनकी नौकरी जाएगी, गिरफ्तार होंगे, और कब्जाई गई संपत्ति राज्य सरकार द्वारा ज़ब्त की जाएगी। मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च स्तरीय विभागीय दंडात्मक कार्रवाई की तैयारी भी शुरू हो चुकी है।

सवाल बड़ा और बेहद निर्णायक है —क्या सिर्फ सस्पेंशन काफी है? क्या राज्य सरकार और गृह विभाग इस ‘सिंडिकेट’ की जड़ें काटने में ईमानदार हैं? क्या वो ताकतें, जिन्होंने शुक्ला को इतना बड़ा बनाया, अब बेनकाब होंगी?या फिर हर घोटाले की तरह यह भी किसी फाइल में दफन कर दिया जाएगा?

कानून, न्याय और वर्दी की साख पर लगी यह चोट तभी ठीक होगी जब गुनाहगारों को जेल की दीवारों के पीछे पहुंचाया जाएगा, और कानपुर में शुक्ला द्वारा बोए गए आतंक और भ्रष्टाचार के बीजों को जड़ से नष्ट किया जाएगा। जनता अब सिर्फ कार्रवाई नहीं, नज़ीर चाहती है — ताकि आने वाले अधिकारियों को पता रहे कि यदि वर्दी बेईमानी का लाइसेंस बनी तो सज़ा उतनी ही कठोर होगी, जितनी उनकी हरकतों ने देश पर चोट की है।

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