नई दिल्ली 1 नवंबर 2028 | विशेष रिपोर्ट। महेंद्र सिंह
इन दिनों सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों पर एक झूठ बार-बार फैलाया जा रहा है — कि “नेहरू और कांग्रेस ने मुस्लिम लीग और जिन्ना के दबाव में वंदे मातरम् गीत पर कैंची चला दी।” यह आरोप आधा सच और पूरा भ्रामक है। जो लोग इतिहास को आधा पढ़ते हैं, वे राष्ट्र की आत्मा के प्रतीकों को राजनीतिक हथियार बना देते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि वंदे मातरम् को किसी ने काटा नहीं, बल्कि उसे भारत की विविधता के सम्मान में संरक्षित किया गया — इस तरह कि हर धर्म, हर व्यक्ति उसे अपनी मातृभूमि के रूप में स्वीकार कर सके।
1870 के दशक का संदर्भ और बंकिमचंद्र की भावना
‘वंदे मातरम्’ का जन्म 1870 के दशक में हुआ, जब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे अपने उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया। उस समय भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था, और यह गीत देशभक्ति की ज्वाला बनकर उठा। इसकी पंक्तियाँ देशभक्ति का प्रतीक बनीं — “सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम्” जैसी पंक्तियों ने स्वतंत्रता सेनानियों में नई जान फूंकी। लेकिन गीत के कुछ छंद देवी दुर्गा के रूपक में मातृभूमि का चित्रण करते हैं, जिससे कुछ मुस्लिम नेता असहज हुए। उनके लिए राष्ट्र की पूजा किसी देवी के रूप में करना धार्मिक दृष्टि से अनुचित प्रतीत हुआ। यह भावना किसी विरोध या राजनीति से नहीं, बल्कि आस्था की बारीक समझ से जुड़ी थी।
1937 का कांग्रेस अधिवेशन: सर्वधर्म समभाव का उदाहरण
1937 के फैज़पुर अधिवेशन में पंडित जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे राष्ट्रनिर्माताओं ने गहन विचार के बाद निर्णय लिया कि केवल ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो छंद — जो पूरी तरह मातृभूमि की प्रशंसा करते हैं और किसी देवी के प्रतीक से मुक्त हैं — सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय गीत के रूप में गाए जाएंगे। यह निर्णय किसी दबाव में नहीं, बल्कि भारत की एकता और समरसता को बनाए रखने की दृष्टि से लिया गया।
याद रखिए — उस समय मुस्लिम लीग देश को बांटने की राजनीति कर रही थी, जबकि कांग्रेस भारत को एकजुट रखने की कोशिश में थी। अगर उस दौर में कांग्रेस ने कट्टर या संकीर्ण रुख अपनाया होता, तो शायद भारत का स्वरूप पाकिस्तान की तरह विभाजित और असहिष्णु हो जाता। नेहरू और मौलाना आज़ाद जैसे नेताओं ने भारत के ताने-बाने को धार्मिक संघर्षों से बचाने के लिए यह संवेदनशील निर्णय लिया था।
संविधान सभा का ऐतिहासिक निर्णय — 24 जनवरी 1950
स्वतंत्र भारत की संविधान सभा में 24 जनवरी 1950 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने वह ऐतिहासिक घोषणा की, जो भारत की समावेशी भावना की प्रतीक बन गई। उन्होंने कहा —
“वंदे मातरम्, जिसने हमारे स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरणा दी, उसे ‘जन गण मन’ के समान सम्मान प्राप्त होगा।”
यानी एक को राष्ट्रगान, और दूसरे को राष्ट्रीय गीत का समान दर्जा दिया गया। यहाँ ‘कैंची’ नहीं चली, बल्कि सम्मान का संतुलन स्थापित किया गया।
कांग्रेस ने काटा नहीं, जोड़ा — जोड़ा भारत की आत्मा को
नेहरू या कांग्रेस ने वंदे मातरम् के किसी हिस्से को अस्वीकार नहीं किया; उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि भारत का हर नागरिक — चाहे वह हिंदू हो, मुस्लिम, सिख, ईसाई या पारसी — राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत दोनों के साथ गर्व से जुड़ सके। यही एक सच्चे धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राष्ट्र की पहचान है।
आज जो लोग यह कहते हैं कि “वंदे मातरम् को जिन्ना की वजह से बदला गया,” वे इतिहास को विकृत कर रहे हैं। सच्चाई यह है कि वंदे मातरम् को कांग्रेस ने ही राष्ट्रीय गरिमा का स्थान दिया, संविधान सभा ने उसे सम्मान का दर्जा दिया, और भारत ने उसे अपनी आत्मा में बसाया।
भारत माता सबकी है, किसी एक धर्म की नहीं
भारत माता की जय का अर्थ किसी देवी के रूप में पूजा नहीं, बल्कि मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता है। नेहरू, मौलाना आज़ाद, टैगोर और पटेल — सभी ने इसे उसी भावना से देखा। इसलिए यह कहना कि वंदे मातरम् “काटा गया”, देश के इतिहास के साथ अन्याय है। सच यह है कि उसे संविधान के पन्नों में अमर किया गया, ताकि भारत का हर नागरिक कह सके —“वंदे मातरम्” — मेरी मातृभूमि की जय, सबकी मातृभूमि की जय।




