लेखक: योगेन्द्र यादव, राजनीतिक विश्लेषक एवं समाजसेवी
30 अक्टूबर 2025
अब पागलपन को एक विधि मिल गई है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) का यह दूसरा राष्ट्रव्यापी संस्करण अब किसी आकस्मिक प्रयोग का हिस्सा नहीं है। पहले यह एक अस्थायी समाधान की तरह था — एक समस्या का तात्कालिक उपाय, या कहें किसी गड़बड़ी को ढकने के लिए उठाया गया कदम। लेकिन अब यह एक स्थायी ढांचा बन गया है, जिसमें कुछ सुधार जरूर किए गए हैं, परंतु इसका मूल स्वभाव वैसा ही है। पहले यह एक कुंद औजार था जो असंगत रूप से मतदाताओं को निकाल देता था; अब वही औजार एक परिष्कृत और सटीक हथियार बन चुका है — लक्षित बहिष्करण के लिए।
हालिया घोषणा चुनाव आयोग की कार्यकुशलता नहीं बल्कि उसकी प्रवृत्ति को दिखाती है — एक ऐसी प्रवृत्ति जिसमें सीखने की बात तो है, पर सुधार की नीयत नहीं। बिहार में किए गए प्रयोग से जो सीख मिली, आयोग ने उससे सुधार नहीं किया बल्कि उसी को “मॉडल” बना दिया। 17 अक्टूबर को इसी कॉलम में बताया गया था कि कैसे बिहार में हुए प्रयोग ने मतदाता सूचियों की गुणवत्ता को सुधारने के बजाय और खराब किया। संशोधित सूचियों में महिलाओं और मुस्लिम मतदाताओं के नामों की असंगत और असमान रूप से विलोपन हुआ, डुप्लिकेट नामों, जंक एंट्रीज़ और मृत लोगों के नामों की गलतियों में सुधार तो नहीं हुआ, लेकिन असली योग्य मतदाताओं की बड़ी संख्या हटा दी गई।
बिहार के अनुभवों से जो सात स्पष्ट निष्कर्ष निकले थे, उन्हें अगर सही मायनों में देखा जाता, तो इस प्रक्रिया को पूरी तरह पुनर्विचारित किया जाना चाहिए था। पर आयोग ने ऐसा नहीं किया। इसके बजाय, उसने उसी दिशा में और तेज़ी से कदम बढ़ाया है।
बिहार से मिली सात बड़ी सीखें
पहला सबक यह था कि हमारी मतदाता सूचियाँ बेहद त्रुटिपूर्ण हैं। यह केवल तकनीकी गलती नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता है। जब पुनरीक्षण प्रक्रिया नियमित तौर पर की जाती है, तो यह मृत और अनुपस्थित मतदाताओं के नाम हटाने का बहाना बन जाती है, पर इसके साथ ही बहुत से वास्तविक मतदाताओं को भी बाहर कर देती है।
दूसरा, “सारांश पुनरीक्षण” (summary revision) की यह प्रक्रिया मूल रूप से दोषपूर्ण है। इसकी वजह से बहुत से जीवित और योग्य मतदाता सूचियों से बाहर हो जाते हैं।
तीसरा, घर-घर जाकर सत्यापन की प्रक्रिया बहुत देर से शुरू की गई। यह एक सही कदम था लेकिन इसे जिस तरीके से लागू किया गया, उसने पूरे मकसद को ही बिगाड़ दिया।
चौथा, हर व्यक्ति को “एन्यूमरेशन फॉर्म” भरने के लिए बाध्य करना एक अत्यधिक नौकरशाही कदम था। यदि कोई व्यक्ति एक महीने में यह फॉर्म नहीं भरता, तो उसके वोट देने का अधिकार स्वतः समाप्त हो जाता है। यह अनुचित था — क्योंकि नागरिक का अधिकार प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़ा नहीं होना चाहिए।
पाँचवाँ, 2003 की मतदाता सूची को आधार बनाना सुधार नहीं था। आयोग ने दावा किया कि इससे सूची “स्वच्छ” बनेगी, लेकिन वस्तुतः इसका कोई तर्कसंगत आधार नहीं था। 2003 की सूची आज के सामाजिक-सांख्यिकीय परिदृश्य से मेल नहीं खाती।
छठा, नए दस्तावेज़ों की मांग ने पूरी प्रक्रिया को और जटिल बना दिया। किसी भी व्यक्ति को वोटर सूची में नाम जोड़ने या सही करने के लिए कई दस्तावेज़, प्रमाण-पत्र और रिश्तेदार के हस्ताक्षर लाने की शर्तें लगाई गईं। इससे गरीब, किरायेदार, महिला और प्रवासी मतदाता — जो पहले से ही दस्तावेज़ों की कमी झेलते हैं — सबसे ज्यादा प्रभावित हुए।
सातवाँ और सबसे अहम, “विदेशियों” या “अवैध मतदाताओं” का कोई प्रमाण कहीं नहीं मिला। फिर भी चुनाव आयोग और सरकार का दावा लगातार यही रहा कि सूची को “साफ़” करने की ज़रूरत है। यह दावा वास्तविकता से परे और राजनीतिक रूप से प्रेरित था।
मतदाता पंजीकरण का बोझ अब मतदाता पर
नए SIR ढाँचे में, चुनाव आयोग मतदाता सूची के अद्यतन की जिम्मेदारी प्रशासन से हटाकर सीधे मतदाता पर डाल रहा है। अब यह मतदाता का दायित्व है कि वह अपने नाम को सूची में बनवाए या बरकरार रखे। यह नीति देखने में “स्वतंत्र नागरिक जिम्मेदारी” जैसी लग सकती है, लेकिन असल में यह एक बहिष्करणकारी नीति है।
वैश्विक अध्ययनों से स्पष्ट है कि जब मतदाता पंजीकरण “स्व-प्रेरित” (self-initiated) हो जाता है, तो 5 से 10 प्रतिशत योग्य मतदाता सूची से बाहर रह जाते हैं। यह अनुपात महिलाओं, अल्पसंख्यकों और गरीबों में और अधिक होता है। अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में भी ऐसे प्रयोग यह दिखाते हैं कि जब नागरिक को खुद जाकर पंजीकरण करना पड़ता है, तो बड़ी संख्या में लोग बाहर रह जाते हैं — विशेषकर वे जो शिक्षा, जागरूकता या साधनों के अभाव में हैं।
बिहार में यही हुआ। बहुत से मतदाता, खासकर ग्रामीण महिलाओं और मुस्लिम समुदाय के लोग, यह प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाए। कोई दस्तावेज़ अधूरा रह गया, किसी ने “निर्धारित फॉर्म” समय पर नहीं भरा, तो किसी के पते का प्रमाण पर्याप्त नहीं था। नतीजा — योग्य नागरिक सूची से बाहर हो गए।
तकनीकी सुधार के नाम पर नागरिकता की जांच
SIR को सुधार की दिशा में उठाया गया कदम बताया गया, पर वास्तविकता में यह एक छिपा हुआ नागरिकता सत्यापन अभियान बन गया। हर मतदाता से यह साबित करवाना कि वह “योग्य नागरिक” है, असम में NRC जैसी सोच का विस्तार है।
बिहार का प्रयोग इस बात का संकेत था कि यह कोई “पायलट प्रोजेक्ट” नहीं था कि देखें सुधार कैसे लागू किया जा सकता है, बल्कि यह देखने का परीक्षण था कि पूर्वनिर्धारित औषधि यानी बहिष्करण को सबसे कुशल तरीके से कैसे लागू किया जाए।
अब इस प्रक्रिया को राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जा रहा है। यानी पूरा भारत, धीरे-धीरे एक “मिनी-NRC” के प्रयोगशाला में बदल रहा है — जहाँ हर वोटर को बार-बार अपनी नागरिकता और अस्तित्व साबित करना होगा।
लोकतंत्र के मूलाधिकार पर हमला
चुनाव आयोग की यह नई रणनीति लोकतंत्र के लिए गहरी चिंता का विषय है। मतदाता सूची से 5 से 10 प्रतिशत योग्य नाम हटाना केवल आंकड़ा नहीं है — यह लोकतांत्रिक अधिकारों का क्षरण है। और जब यह प्रक्रिया महिलाओं, दलितों, अल्पसंख्यकों या गरीब वर्गों को disproportionately प्रभावित करती है, तब यह केवल प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि राजनीतिक असमानता का औजार बन जाती है।
भारत में सार्वभौमिक मताधिकार संविधान की आत्मा है। इसे नागरिकता के प्रमाण-पत्र में बदल देना, लोकतंत्र की बुनियाद पर प्रहार है।
SIR को सुधार के नाम पर लागू किया गया, पर यह सुधार नहीं, बल्कि बहिष्करण का सुव्यवस्थित संस्करण है।
(साभार : दि इंडियन एक्सप्रेस)




