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असम में ध्रुवीकरण की स्क्रिप्ट: ‘लव जिहाद’ कानून से संविधान पर वार

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विशेष रिपोर्ट सिलचर से | 27 अक्टूबर 2025

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा द्वारा घोषित तथाकथित “लव जिहाद विरोधी कानून” ने न सिर्फ राजनीतिक हलचल पैदा की है, बल्कि इसे लेकर संवैधानिक बहस भी तेज हो गई है। सरमा ने कहा है कि प्रस्तावित कानून में आरोपी युवक के माता-पिता की गिरफ्तारी का प्रावधान शामिल होगा — यानी अगर किसी मुस्लिम युवक पर ‘लव जिहाद’ का आरोप लगता है, तो उसके माता-पिता भी जेल जा सकते हैं, चाहे उनका अपराध से कोई लेना-देना न हो।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कानून प्रेम या सुरक्षा के नाम पर नहीं, बल्कि धार्मिक ध्रुवीकरण की नई पटकथा है — ताकि असम में बीजेपी अपने हिंदू वोट बैंक को और अधिक मजबूत कर सके। यह कदम न केवल अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार) का उल्लंघन माना जा रहा है, बल्कि इसे संविधान पर सीधा हमला भी कहा जा रहा है।

मानवाधिकार संगठनों ने इसे परिवार और सामाजिक रिश्तों में दखल देने वाला कानून करार दिया है, वहीं विपक्ष ने मुख्यमंत्री सरमा पर तानाशाही मानसिकता अपनाने का आरोप लगाया है। फिलहाल राज्य सरकार ने संकेत दिया है कि यह विवादास्पद बिल आगामी विधानसभा सत्र में पेश किया जाएगा। सवाल यह भी उठ रहा है — क्या अब प्रेम, परवरिश और पारिवारिक संबंध भी राजनीतिक एजेंडा बन चुके हैं?

और सबसे बड़ा सवाल —क्या असम का यह प्रस्तावित कानून भारत के संविधान, अनुच्छेद 21 और मानव स्वतंत्रता की भावना को चुनौती देने वाला नया अध्याय बनेगा? क्योंकि यह बयान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21, यानी “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार” का सीधा उल्लंघन माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी व्यक्ति के अपराध के लिए उसके माता-पिता को सजा देना “सामूहिक दंड” (collective punishment) की अवधारणा है — जो न केवल असंवैधानिक बल्कि नैतिक रूप से भी अस्वीकार्य है। वरिष्ठ वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे राज्य की “तानाशाही प्रवृत्ति” बता रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने अपने बयान में कहा कि “हम उन महिलाओं को बचाना चाहते हैं जो लव जिहाद और पोलिगैमी का शिकार बनती हैं। अगर कोई युवक इस अपराध में पकड़ा जाता है, तो उसके माता-पिता को भी जिम्मेदार ठहराया जाएगा क्योंकि परवरिश भी अपराध में भागीदारी का संकेत है।”

सरमा के इस कथन ने पूरे देश में आलोचना की बौछार खड़ी कर दी। लोग पूछ रहे हैं कि “अगर आरोपी के माता-पिता मर चुके हों तो क्या मुख्यमंत्री उनकी कब्रें खुदवाएंगे?और अगर उन्होंने पहले ही अपने बेटे से नाता तोड़ लिया है तो क्या फिर भी गिरफ्तारी होगी?”

विपक्ष ने इस बयान को “राजनीतिक नौटंकी” बताते हुए कहा कि हिमंता बिस्वा सरमा ‘संविधान से ऊपर खुद को समझने लगे हैं।’ कांग्रेस ने तीखे शब्दों में कहा कि “मुख्यमंत्री कानून के नाम पर निजी जिंदगी में हस्तक्षेप कर रहे हैं। प्यार, विवाह और परिवार — ये निजी विषय हैं, सरकार की जेल नहीं।”

कानूनी विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर यह कानून पास हुआ तो यह संविधान की मूल भावना, ‘न्याय, स्वतंत्रता और समानता’ पर हमला होगा। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों और संवैधानिक विद्वानों का कहना है कि इस तरह का प्रावधान भारतीय लोकतंत्र को “पुलिस राज्य” की दिशा में धकेलेगा।

मानवाधिकार संगठनों ने इसे राज्य द्वारा भय और विभाजन फैलाने की साज़िश बताया है। एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा, “मुख्यमंत्री संविधान नहीं, प्रचार की भाषा बोल रहे हैं। लव जिहाद का कोई कानूनी अस्तित्व नहीं है, यह शब्द सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए गढ़ा गया है।” सोशल मीडिया पर हिमंता बिस्वा सरमा को लेकर व्यंग्य की लहर चल रही है।

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