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पहली ग्लोबल साइबर क्राइम संधि पर हस्ताक्षर, रूस की पहल से टेक कंपनियों और मानवाधिकार समूहों में हड़कंप

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वियतनाम में हुई ऐतिहासिक पहल — 60 देशों ने किए हस्ताक्षर

दुनिया भर में बढ़ते साइबर अपराधों के बीच एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में पहली वैश्विक साइबर अपराध रोकने की संधि (UN Cybercrime Treaty) पर हस्ताक्षर किए गए। यह समझौता वियतनाम की राजधानी हनोई में आयोजित एक विशेष समारोह में हुआ, जिसमें संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेश और वियतनाम के राष्ट्रपति लुओंग कुओंग समेत कई वैश्विक नेता मौजूद रहे। वियतनामी राष्ट्रपति ने इसे “मील का ऐतिहासिक पत्थर” बताया और कहा कि यह समझौता डिजिटल अपराधों से निपटने में अंतरराष्ट्रीय एकजुटता का प्रतीक बनेगा। 60 देशों ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए हैं, हालांकि उनके नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। संधि तब प्रभाव में आएगी जब कम से कम 40 देश इसे आधिकारिक रूप से अनुमोदित करेंगे।

रूस की पहल से शुरू हुई प्रक्रिया, सात वर्षों की कूटनीतिक जद्दोजहद के बाद सफलता

संयुक्त राष्ट्र की यह साइबर अपराध विरोधी संधि रूस द्वारा 2017 में प्रस्तावित की गई थी। कई वर्षों तक चली लंबी वार्ताओं, विवादों और तकनीकी चर्चाओं के बाद अंततः 2024 में इसे संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मंजूरी दी। विश्लेषकों का कहना है कि इस संधि पर हस्ताक्षर करने वाले देश केवल रूस और चीन जैसे सहयोगियों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि कई पश्चिमी और एशियाई राष्ट्र भी इसमें शामिल हैं। हालांकि, इस तथ्य ने भी विवाद को जन्म दिया है कि रूस, जो स्वयं कई अंतरराष्ट्रीय साइबर हमलों और हैकिंग ऑपरेशनों का आरोपी रहा है, वह अब इस संधि का सबसे प्रमुख प्रणेता बन गया है। आलोचकों का कहना है कि इससे इस समझौते की निष्पक्षता और उद्देश्य पर प्रश्नचिह्न लग जाता है।

उद्देश्य — वैश्विक स्तर पर साइबर अपराधों के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई

इस संधि का मुख्य उद्देश्य डिजिटल अपराधों जैसे ऑनलाइन ठगी, मनी लॉन्ड्रिंग, डेटा चोरी, बाल अश्लीलता और पहचान की जालसाजी जैसी गतिविधियों पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया भर में साइबर अपराधों से हर साल अरबों डॉलर का नुकसान होता है और कई देशों में सरकारी तंत्र तक डिजिटल हमलों की चपेट में आते हैं। यह संधि एक ऐसे वैश्विक कानूनी ढांचे की स्थापना की दिशा में कदम है, जो देशों को एक-दूसरे के साथ अपराधियों की जानकारी साझा करने, साइबर जांच में सहयोग देने और सीमा पार डिजिटल अपराधों पर नियंत्रण करने के लिए बाध्य करेगा।

टेक कंपनियों और मानवाधिकार संगठनों की चिंताएं — “सरकारी निगरानी बढ़ेगी”

इस संधि को लेकर मानवाधिकार संगठनों और तकनीकी कंपनियों ने गहरी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह समझौता कई देशों को सरकारी निगरानी और डेटा नियंत्रण का अतिरिक्त अधिकार देगा, जिससे निजता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा बढ़ सकता है। टेक ग्लोबल इंस्टीट्यूट की संस्थापक सबहानाज राशिद दिया ने कहा कि संधि का वह प्रावधान बेहद चिंताजनक है जिसमें निजी कंपनियों को यूज़र डेटा सरकारों के साथ साझा करने के लिए बाध्य किया जा सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि “यह संधि उन प्रथाओं को वैधता दे सकती है जिनका इस्तेमाल कई अधिनायकवादी देश पहले से ही पत्रकारों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ कर रहे हैं।”

‘साइबरसिक्योरिटी टेक अकोर्ड (Cybersecurity Tech Accord)’ — जिसमें मेटा, डेल और भारत की इंफोसिस जैसी 160 बड़ी टेक कंपनियाँ शामिल हैं — ने इस समारोह में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया। इन कंपनियों ने पहले ही चेतावनी दी थी कि इस संधि से साइबर रिसर्च को अपराध की श्रेणी में डाला जा सकता है और इससे इंटरनेट की सुरक्षा कमजोर हो सकती है।

मानवाधिकार समूहों का आरोप — “सुरक्षा प्रावधान कमजोर, पारदर्शिता का अभाव”

कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इस समझौते पर गहरी निराशा व्यक्त की है। एक दर्जन से अधिक समूहों द्वारा जारी एक संयुक्त बयान में कहा गया कि यह संधि मानवाधिकारों की सुरक्षा के पर्याप्त प्रावधानों से वंचित है।

इन समूहों ने चिंता जताई कि कई देशों में सरकारें पहले से ही “राष्ट्रीय सुरक्षा” के नाम पर इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की निगरानी करती हैं, और यह संधि अब उन्हें कानूनी संरक्षण प्रदान कर देगी। ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ की शोधकर्ता डेब्रा ब्राउन ने कहा कि “वियतनाम जैसा देश, जो अपने यहां ऑनलाइन अभिव्यक्ति को नियंत्रित करता है, उसे इस वैश्विक सम्मेलन की मेजबानी देना एक गलत संदेश है।”

वियतनाम की मेजबानी पर सवाल और रूस की भूमिका पर शंका

संधि पर हस्ताक्षर का आयोजन वियतनाम में किया जाना भी विवाद का विषय बन गया। आलोचकों ने कहा कि वियतनाम में इंटरनेट सेंसरशिप और सरकार-विरोधी अभिव्यक्तियों पर दमन का लंबा इतिहास रहा है।

ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के अनुसार, वियतनामी सरकार ने हाल के वर्षों में उन नागरिकों को जेल भेजा है जिन्होंने सोशल मीडिया पर नेताओं की आलोचना की थी। ऐसे में इस सम्मेलन की मेजबानी उस देश को देना स्वतंत्रता और पारदर्शिता के सिद्धांतों के विपरीत माना जा रहा है।रूस की भूमिका को लेकर भी संदेह गहराया है। विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया में अधिकांश साइबर अपराधों की जड़ रूस से जुड़ी होती है, और फिर भी वही देश इस वैश्विक संधि का “आर्किटेक्ट” बना है। यह विडंबना अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नए शक्ति-संतुलन की दिशा को दर्शाती है।

 डिजिटल सुरक्षा बनाम डिजिटल स्वतंत्रता की लड़ाई अब वैश्विक

यह पहली बार है जब विश्व स्तर पर साइबर अपराधों से निपटने के लिए कोई संयुक्त राष्ट्र समर्थित कानूनी ढांचा तैयार हुआ है। लेकिन यह संधि सिर्फ डिजिटल सुरक्षा का प्रतीक नहीं, बल्कि डिजिटल स्वतंत्रता के भविष्य की जंग का भी केंद्र बन गई है। जहाँ सरकारें इसे “सुरक्षा और सहयोग की नई शुरुआत” कह रही हैं, वहीं अधिकार समूह इसे “डिजिटल युग में निगरानी तंत्र का विस्तार” बता रहे हैं।

आने वाले महीनों में यह देखा जाएगा कि क्या यह संधि वास्तव में साइबर अपराधों के खिलाफ वैश्विक एकजुटता ला पाएगी या फिर यह डिजिटल युग की सबसे विवादित राजनीतिक संधियों में से एक बनकर रह जाएगी।

 

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