कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने उद्योगपति नारायण मूर्ति और उनकी पत्नी सुधा मूर्ति द्वारा कर्नाटक सरकार के सामाजिक-आर्थिक जाति सर्वेक्षण (Socio-Economic Caste Survey) से बाहर रहने के निर्णय पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि यह फ़ैसला केवल व्यक्तिगत विचार नहीं, बल्कि समाज के उस वर्ग की मानसिकता का प्रतीक है जो विशेषाधिकार में पला-बढ़ा है और वास्तविक सामाजिक विषमताओं से अनभिज्ञ है। सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि “देर से सही, लेकिन इस मुद्दे पर बोलना ज़रूरी है। नारायण मूर्ति और सुधा मूर्ति द्वारा इस सर्वेक्षण में भाग न लेने का निर्णय कोई आश्चर्य नहीं है। उनकी उपलब्धियाँ निस्संदेह असाधारण हैं, लेकिन यह रुख इस बात को दर्शाता है कि विशेषाधिकार केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी गहराई तक मौजूद है।”
सुप्रिया श्रीनेत ने आगे कहा कि “मैं जाति में विश्वास नहीं करता” कहना एक अत्यंत विशेषाधिकारपूर्ण और आत्मसंतुष्ट तर्क है, जो अक्सर उन्हीं लोगों के मुँह से सुनाई देता है जो तथाकथित ‘ऊँची जातियों’ से आते हैं। यह तर्क देखने में उदार और आधुनिक लगता है, लेकिन दरअसल यह उस सामाजिक सच्चाई को नकारने जैसा है जो सदियों से हमारे समाज की संरचना में गहराई तक धंसी हुई है। उन्होंने कहा कि सामाजिक-आर्थिक जाति सर्वेक्षण किसी विभाजन का औजार नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण नीति निर्माण का सबसे प्रभावी माध्यम है। यह सर्वेक्षण इस बात का सटीक चित्रण करता है कि देश में संपत्ति, शिक्षा और सत्ता का वितरण वास्तव में कितना असमान है, और किन वर्गों को विकास के अवसरों से लगातार वंचित रखा गया है।
कांग्रेस प्रवक्ता ने यह भी कहा कि आज भी भारत में दलित, आदिवासी और ओबीसी समुदाय संसाधनों, शिक्षा, रोज़गार और सामाजिक शक्ति से अनुपातहीन रूप से वंचित हैं। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि सामाजिक-आर्थिक जाति सर्वेक्षण की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है, क्योंकि यह आंकड़ों पर आधारित नीतियों के ज़रिए वास्तविक सामाजिक समानता की दिशा में ठोस कदम उठाने का अवसर देता है। सुप्रिया ने कहा कि “इस सर्वेक्षण से इंकार करना, दरअसल सदियों से चली आ रही जातिगत असमानता और भेदभाव की सच्चाई से मुँह मोड़ना है। यह वही समय है जब देश को आँकड़ों पर आधारित न्यायसंगत नीतियों की सबसे अधिक आवश्यकता है, ताकि हम बराबरी के उस समाज की ओर बढ़ सकें जिसकी परिकल्पना संविधान ने की थी।”
अपने बयान के अंत में सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि “ज़रा एक पल को अपने विशेषाधिकार को किनारे रखिए, और तब आपको समझ आएगा कि यह सर्वेक्षण क्यों ज़रूरी है, ख़ासकर उनके लिए जो वास्तव में समाज की भलाई, समानता और न्याय की बात करते हैं।” उन्होंने कहा कि यह कोई राजनीतिक या वैचारिक मुद्दा नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी का विषय है। सुप्रिया ने यह भी जोड़ा कि केवल तब ही जब समाज अपने भीतर की असमानताओं को स्वीकार करेगा, वह सच्चे अर्थों में समानता की दिशा में आगे बढ़ पाएगा।
सुप्रिया श्रीनेत का यह बयान सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा का विषय बन गया है। ट्विटर (X), फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम पर उनके शब्दों को “साहसिक और ज़मीनी सच्चाई को उजागर करने वाला” बताया जा रहा है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सुप्रिया श्रीनेत ने एक बार फिर यह साबित किया है कि कांग्रेस पार्टी सामाजिक न्याय और समान अवसरों के मुद्दे को लेकर गंभीर है, जबकि दूसरी ओर समाज का एक वर्ग अब भी अपने विशेषाधिकार को ‘निष्पक्षता’ के नाम पर छिपाने की कोशिश कर रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों से दलित, ओबीसी और छात्र संगठनों ने भी सुप्रिया श्रीनेत के बयान का समर्थन किया है और मांग की है कि इस सर्वेक्षण को पूरे देश में लागू किया जाए ताकि वास्तविक सामाजिक समानता के रास्ते पर ठोस नीति-निर्माण संभव हो सके।




