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राजनीतिक जाल: ‘मुस्लिम मुख्यमंत्री’ का शोर क्यों मचा रही है बीजेपी की सहयोगी जमात?

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पटना/ नई दिल्ली 25 अक्टूबर 2025

बिहार की राजनीतिक ज़मीन पर एक बार फिर से ‘मुस्लिम मुख्यमंत्री’ का बेमानी और भ्रामक मुद्दा ज़ोर-शोर से उछाला जा रहा है। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान ने सोशल मीडिया पर अपने मृत पिता रामविलास पासवान की बलिदानी गाथा सुनाते हुए, मुस्लिम समुदाय पर यह सीधा आरोप मढ़ दिया कि “बंधुआ वोट बैंक बनकर रहने” के कारण उन्हें सम्मान और भागीदारी नहीं मिलती। यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है; यह एक शातिर चाल है जिसका उद्देश्य मुस्लिम समुदाय को धार्मिक बहसों के जाल में फंसाकर, बीजेपी और उसके सहयोगियों के मुख्य एजेंडे – धार्मिक ध्रुवीकरण – को मज़बूत करना है। सवाल यह नहीं है कि मुस्लिम मुख्यमंत्री बनेगा या नहीं; सवाल यह है कि क्या अब भी मुख्यमंत्री का धर्म मायने रखता है, या फिर यह सिर्फ एक राजनीतिक हथियार है जिसे बीजेपी और उसकी सहयोगी ताकतें असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए इस्तेमाल कर रही हैं? यह आरोप लगाना कि राष्ट्रीय जनता दल (राजद) मुस्लिम मुख्यमंत्री नहीं देगा, जबकि 2005 में पासवान ने ख़ुद ही अपनी पार्टी कुर्बान कर दी थी, यह सिद्ध करता है कि यह बयान इतिहास का सच नहीं, वर्तमान की राजनीतिक चाल है।

इतिहास का तमाचा: देश में सर्वोच्च पदों पर मुस्लिम, फिर यह ‘नया’ मुद्दा क्यों?

चिराग पासवान और उनके गुट को यह समझने की ज़रूरत है कि ‘मुस्लिम मुख्यमंत्री’ का मुद्दा न नया है, न प्रासंगिक। यह सिर्फ राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए ज़िंदा रखा जा रहा एक सड़ा-गला एजेंडा है। इतिहास के पन्ने चीख-चीखकर गवाही देते हैं: 1973 में, जब आज की तरह धार्मिक ज़हर फैला नहीं था, तब इंदिरा गांधी ने बिहार में अब्दुल गफूर को मुख्यमंत्री बनाया था— यह बिहार का वह गौरवशाली दौर था जब नेतृत्व की योग्यता को धर्म से ऊपर रखा जाता था। इतना ही नहीं, राजस्थान जैसे कम मुस्लिम आबादी वाले राज्य में भी बरकतुल्लाह खान मुख्यमंत्री बने। देश ने राष्ट्रपति, केंद्रीय गृहमंत्री, चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया (CJI), और एयर चीफ़ मार्शल जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर मुसलमानों को बैठाया है। यह इतिहास का अटूट सत्य है कि नेतृत्व को कभी धर्म के चश्मे से नहीं देखा गया। इसलिए, आज यह सवाल उठाना संविधान का अपमान और देश की धर्मनिरपेक्ष विरासत पर काला धब्बा है। यह मुद्दा सिर्फ एक मानसिक जाल है, जिसे विपक्षी दलों को उकसाने और फिर उन्हें ‘तुष्टिकरण’ का ठप्पा लगाने के लिए बनाया गया है।

दोहरा चरित्र: अपमान करने वाले ही क्यों पूछते हैं ‘मुख्यमंत्री का धर्म’?

यहाँ सबसे बड़ा और असली सवाल उन तमाम राजनीतिक नेताओं और गोदी मीडिया से पूछा जाना चाहिए जो आज ‘मुस्लिम मुख्यमंत्री’ का जाप कर रहे हैं। जिस भाजपा और उसके समर्थकों की बदौलत आज देश में नफरत और विभाजन का माहौल है, वे किस मुंह से मुस्लिम भागीदारी की बात करते हैं? क्या चिराग पासवान ने कभी पूछा कि गिरिराज सिंह, योगी आदित्यनाथ और अन्य नेता खुलेआम मुस्लिम समुदाय के लिए ‘नमकहराम’ जैसे अपमानजनक शब्दों का प्रयोग क्यों करते हैं? क्या उन्होंने कभी पूछा कि चुनाव का ‘बुर्के’ या ‘हिजाब’ से क्या लेना-देना है? यह वही दोहरा चरित्र है जो आज बिहार और देश की राजनीति का सबसे बड़ा ज़हर बन चुका है: पहले मुसलमानों के नाम पर बयानबाज़ी करके उन्हें अपमानित करना, फिर उसी समुदाय के नाम पर घड़ियाली आँसू बहाना और राजनीतिक ‘चेक’ जारी करना। यह राजनीतिक पाखंड है, जिसका सीधा परिणाम यह होता है कि रोज़गार, शिक्षा और सुरक्षा जैसे असली मुद्दे हर बहस से गायब हो जाते हैं। उन्हें मुख्यमंत्री नहीं चाहिए, उन्हें चाहिए कि उनके नाम पर हिंदुओं को डराया न जाए और उन्हें समान अवसर मिलें!

राजनीति का शातिर खेल: विपक्ष को धार्मिक प्रतिक्रिया में उलझाना ही लक्ष्य

यह पूरा राजनीतिक शोरगुल केवल एक शातिर और मानसिक जाल है। बीजेपी इस ‘मुस्लिम मुख्यमंत्री’ का मुद्दा इसलिए उछाल रही है ताकि विपक्ष दबाव में आकर कोई घोषणा कर दे, जैसे कि ‘हाँ, हम मुस्लिम उपमुख्यमंत्री बनाएंगे’ — और फिर वही पार्टी तुरंत उसे “मुस्लिम तुष्टिकरण” का ठप्पा लगाकर, हिंदू वोट बैंक को साध सके। यह जानते हुए कि मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव होंगे, विपक्ष के भीतर एक मुस्लिम उपमुख्यमंत्री का होना राजनीतिक रूप से स्वाभाविक है। लेकिन अगर विपक्ष यह घोषणा कर दे, तो यही समूह शोर मचाएगा कि “देखो, तुष्टिकरण हो रहा है!” मुस्लिम समाज को इस दिमाग़ी चाल को समझने की ज़रूरत है। यह राजनीति का सबसे गंदा रूप है — जहाँ एक समुदाय को पहले सवाल करने के लिए उकसाया जाता है, और फिर सवाल करने पर गद्दार कहा जाता है। विपक्ष को चाहिए कि वह इस धार्मिक प्रतिक्रिया में न फंसे और अपने एजेंडे को रोजगार, स्वास्थ्य और सुरक्षा पर केंद्रित रखे।

यह चुनाव नहीं, ‘समझ’ का इम्तिहान है

राजनीतिक विश्लेषक सही कहते हैं: प्रधानमंत्री मोदी और उनकी राजनीति तभी हार सकती है जब उनकी धार्मिक ध्रुवीकरण की रणनीति को बार-बार और निर्णायक रूप से असफल किया जाए। बिहार के मुस्लिम समुदाय, और वास्तव में बिहार के हर नागरिक को यह समझना होगा कि धर्म आधारित बहसों में उलझना सीधे-सीधे भाजपा के एजेंडे को मज़बूत करता है। यह मुसलमानों की राजनीतिक समझ का असली इम्तिहान है — कि वे इस बार न किसी लालच (मुख्यमंत्री पद का लालच) में आएं, और न किसी डर (अपमान का डर) में। क्योंकि लोकतंत्र में असली ताक़त वोट की नहीं, बल्कि समझ और सामूहिक विवेक की होती है। आज बिहार को ‘मुस्लिम मुख्यमंत्री’ नहीं, बल्कि न्याय, रोज़गार, शिक्षा और सुरक्षा की गारंटी चाहिए। यह राज्य तभी बदलेगा जब हर व्यक्ति — हिंदू हो या मुस्लिम — एक साथ खड़ा होकर कहे: “हमें धर्म नहीं, काम चाहिए।” धर्म की राजनीति ने देश का बहुत नुकसान कर दिया है; अब वक्त है कि बिहार विकास की राजनीति की शुरुआत करे।

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