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कर्पूरी ठाकुर को गिराने वाले अब कर रहे हैं गुणगान: जयराम रमेश का मोदी पर सीधा वार

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नई दिल्ली, 24 अक्टूबर 2025

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जननायक कर्पूरी ठाकुर के पैतृक गाँव के दौरे से पहले कांग्रेस ने एक बार फिर भाजपा और संघ पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री से तीन सीधे सवाल पूछते हुए कहा कि अगर वह वास्तव में करपूरी ठाकुर जी के आदर्शों का सम्मान करते हैं, तो उन्हें पहले उनके साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार करना चाहिए, जिसमें जनसंघ और आरएसएस ने निर्णायक भूमिका निभाई थी।

कांग्रेस के तीन तीखे सवाल

  1. क्या यह ऐतिहासिक तथ्य नहीं है कि अप्रैल 1979 में जब जननायक कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में पिछड़े वर्गों (OBCs) के लिए आरक्षण लागू किया था, तब जनसंघ — जिससे भाजपा बाद में बनी — ने उनकी सरकार गिरा दी थी? क्या यह भी सच नहीं कि उस समय आरएसएस और जनसंघ के नेताओं ने कर्पूरी ठाकुर के खिलाफ घृणित शब्दों और जातीय पूर्वाग्रहों से भरे हमले किए थे?
  1. क्या यह सच नहीं है कि खुद प्रधानमंत्री ने 28 अप्रैल 2024 को उन लोगों को ‘अर्बन नक्सल’ कहा था जो जातीय जनगणना की मांग कर रहे थे? क्या यह भी सही नहीं है कि 20 जुलाई 2021 को संसद में और 21 सितंबर 2021 को सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार ने स्पष्ट रूप से जातीय जनगणना को अस्वीकार किया था?
  1. क्या यह सच नहीं है कि बिहार में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी और ईबीसी के लिए 65% आरक्षण को संवैधानिक सुरक्षा देने के मामले में मोदी सरकार और उसकी “ट्रबल-इंजन” डबल इंजन सरकार पूरी तरह विफल रही है? जबकि सितंबर 1994 में कांग्रेस सरकार ने तमिलनाडु में इसी तरह के कानून को संवैधानिक संरक्षण (Ninth Schedule) के तहत शामिल कर सुरक्षित किया था।

“प्रधानमंत्री जवाब दें, दिखावा नहीं करें” — जयराम रमेश

जयराम रमेश ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी अब जब करपूरी ठाकुर जी के गाँव जा रहे हैं, तो उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि उनके राजनीतिक पूर्वजों — जनसंघ और आरएसएस — ने ही ठाकुर जी के समाजवादी मिशन को जातिगत घृणा और सत्ता की साज़िशों से कुचलने की कोशिश की थी।

उन्होंने कहा कि “प्रधानमंत्री अगर वास्तव में पिछड़ों के हक़ की बात करते हैं, तो पहले यह बताएं कि उन्होंने जातीय जनगणना को क्यों रोका? और बिहार में 65% आरक्षण कानून की रक्षा के लिए केंद्र सरकार ने कौन-सा कदम उठाया?”

रमेश ने कहा कि “बीजेपी सिर्फ़ प्रतीकों की राजनीति करती है, विचारधारा की नहीं।” कर्पूरी ठाकुर का नाम लेना आसान है, लेकिन उनके विचारों को अपनाना भाजपा के लिए असंभव है क्योंकि भाजपा की राजनीति ही सामाजिक न्याय और समता के विरोध पर खड़ी है।

कर्पूरी ठाकुर की विरासत और भाजपा का विरोधाभास

कर्पूरी ठाकुर — जिन्हें “जननायक” कहा जाता है — ने 1978-79 में बिहार में 27% आरक्षण नीति लागू की थी। यह भारत में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की दिशा में सबसे बड़ा कदम था। लेकिन उस समय जनसंघ और आरएसएस से जुड़े नेताओं ने इस कदम का विरोध किया, यह कहते हुए कि इससे समाज “विभाजित” होगा। अंततः ठाकुर जी की सरकार जनसंघ समर्थित विधायकों के असहयोग से गिरा दी गई। आज वही राजनीतिक धारा, जो तब ठाकुर के आरक्षण मॉडल के खिलाफ थी, अब उनके नाम पर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रही है।

राजनीतिक विश्लेषण: कांग्रेस ने छेड़ा सामाजिक न्याय बनाम प्रतीकवाद का मुद्दा

कांग्रेस ने मोदी सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए सामाजिक न्याय बनाम प्रतीकात्मक राजनीति की बहस को फिर जीवित कर दिया है। पार्टी का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी “OBC कार्ड” खेलने में माहिर हैं, लेकिन नीतिगत रूप से उन्होंने पिछड़ों के अधिकारों को कमजोर किया है। जातीय जनगणना का विरोध, आरक्षण कानूनों की रक्षा न करना और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर चुप्पी — ये सब भाजपा के “विकास और समानता” के दावों पर सवाल उठाते हैं।

कांग्रेस का संदेश साफ़:

“करपूरी ठाकुर जी का सम्मान भाषणों से नहीं, नीतियों से होता है।” अगर प्रधानमंत्री सच में उनके आदर्शों को मानते हैं, तो उन्हें पिछड़ों की गिनती करवानी चाहिए, उनके अधिकारों को संवैधानिक रूप से सुरक्षित करना चाहिए, और समाज को बराबरी के रास्ते पर लाना चाहिए — न कि सिर्फ़ फोटो-ऑप और श्रद्धांजलि की राजनीति करनी चाहिए। कांग्रेस के सवालों ने प्रधानमंत्री के कर्पूरी ठाकुर दौरे को राजनीतिक प्रतीकवाद बनाम सामाजिक न्याय के टकराव का रूप दे दिया है। अब गेंद प्रधानमंत्री के पाले में है — क्या वह इतिहास का सामना करेंगे या फिर उसे भी प्रचार के रंग में रंग देंगे?

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