पटना, 24 अक्टूबर 2025
बिहार का यह चुनाव अब केवल दो राजनीतिक गठबंधनों या दो चेहरों के बीच की पारंपरिक लड़ाई नहीं रह गया है; यह सीधे तौर पर दो विरोधाभासी सच्चाइयों का टकराव बन चुका है—एक तरफ, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेतृत्व वाला महागठबंधन है, जिसने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद के साफ़ चेहरे के रूप में पेश करके अपनी आंतरिक ढीली गाँठों को मज़बूत किया है और जनता के सामने एक स्पष्ट विकल्प रखा है, यह संकेत देते हुए कि “अब लड़ाई विचारों की नहीं, इरादों की है।” वहीं दूसरी तरफ, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) है, जो आज भी बिना किसी विश्वसनीय भविष्य के चेहरे, बिना जनता के सवालों के जवाब और बिना किसी मज़बूत भरोसे के मैदान में उतरा है। महागठबंधन का यह कदम न केवल विपक्षी एकता को मजबूती देता है, एनडीए को दबाव में भी लाता है, जहाँ नीतीश कुमार के “अनिश्चित भविष्य” ने गठबंधन की रणनीति को कमज़ोर कर दिया है।
जनता खुलेआम यह सवाल पूछ रही है कि “अगर नीतीश नहीं तो वोट किसके नाम पर मांगा जा रहा है?” एनडीए, विशेषकर प्रधानमंत्री मोदी की रैलियाँ, भी अब पहले जैसा उत्साह पैदा नहीं कर पा रही हैं, क्योंकि जनता के भीतर एक डर नहीं, बल्कि गहरा गुस्सा पल रहा है—वह गुस्सा जो इस भावना से उपजता है कि “हम वोट देते हैं, पर जीत कोई और जाता है।” यह बिहार का चुनाव अब मात्र सरकार बनाने का नहीं, बल्कि लोकतंत्र के आधारभूत सिद्धान्तों पर चल रही एक जनमत संग्रह की तरह है।
इस चुनावी संघर्ष का मूल अब चुनावी धांधली और “सिस्टम की साजिश” के गहरे मुद्दे पर केंद्रित हो गया है। देश के हर कोने, हरियाणा से महाराष्ट्र, ओडिशा से दिल्ली, और अब बिहार तक—यह भावना गहराई तक उतर चुकी है कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अब ईमानदारी से नहीं, बल्कि संगठित चुनावी अपराध और चालबाज़ी से चुनाव जीत रही है। ईवीएम की विश्वसनीयता से लेकर बूथ मैनेजमेंट, डेटा सर्वर की पारदर्शिता से लेकर पोस्टल बैलेट तक—हर स्तर पर हेराफेरी के गंभीर आरोप लगे हैं, और हर बार विजेता एक ही पार्टी बनकर उभरती है।
यह संयोग नहीं, बल्कि सत्ता द्वारा लोकतंत्र को बंधक बनाने का संकेत है। बीजेपी ने न केवल चुनावी प्रक्रियाओं को प्रभावित किया है, बल्कि चुनाव आयोग, आयकर विभाग, सीबीआई और ईडी जैसी संवैधानिक संस्थाओं को भी अपनी जेब में डाल लिया है। ये वही संस्थाएँ हैं जिन्हें संविधान ने निष्पक्षता का प्रहरी बनाया था, लेकिन आज वे सत्ता की ढाल बनकर खड़ी हैं। जब चुनाव आयोग ‘चुप’, मीडिया ‘खरीद’ लिया गया है, तब सच्चाई बोलने की और लोकतंत्र की आत्मा को बचाने की ज़िम्मेदारी जनता के सिर आ गई है। यही कारण है कि “वोट चोरी” का मुद्दा अब केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि लोकतंत्र बचाने की सबसे बड़ी लड़ाई बन गया है।
यह आक्रोश और गुस्सा, जो 2024 के लोकसभा चुनावों से शुरू हुआ था, अब बिहार में भड़कने को तैयार है और यह सीधे उन लोगों को संबोधित है जो मानते हैं कि उनका वोट गिनती में नहीं आता है, उन बेरोज़गार युवाओं को जो व्यवस्था से टूट चुके हैं, और उन किसानों को जो अपनी फसल से पहले अपनी वोट की कीमत बिकते देख रहे हैं। इन सभी को अब एकजुट होकर कहना होगा—”वोट हमारा, हक़ हमारा—कोई चुराएगा नहीं दोबारा!” चुनावी विश्लेषक इस बात पर एकमत हैं कि महागठबंधन ने तेजस्वी यादव को आगे करके न सिर्फ एक मज़बूत चेहरा पेश किया है, बल्कि उसने एनडीए की गैर-जवाबदेही और भ्रम की रणनीति को भी ध्वस्त किया है।
अब सवाल यह नहीं है कि अगला मुख्यमंत्री कौन बनेगा—सवाल यह है कि क्या इस बार जनता का वोट सही तरीके से गिना जाएगा, या फिर वह सत्ता की फाइलों में गुम हो जाएगा? यह चुनाव लोकतंत्र के उस दौर में हो रहा है जब वोट की कीमत ₹80 में आंकी जा रही है, जब ईवीएम की पारदर्शिता पर ताले जड़े हैं, और जब अधिकांश मीडिया जनता की आवाज़ बनने से इनकार कर चुका है। ऐसी परिस्थिति में, जनता ही इस भ्रष्ट सिस्टम का एकमात्र इलाज है।
यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि सिस्टम को सुधारने का चुनाव है। वोट चोरी का जवाब केवल भारी और निर्णायक वोट से ही दिया जा सकता है, और यह जनता की अदालत में चलने वाली सबसे बड़ी सुनवाई होगी, जहाँ अंतिम फैसला किसी कोर्ट में नहीं, बल्कि हर मतदान केंद्र पर लिखा जाएगा। यह चुनाव प्रत्येक नागरिक के लिए एक अंतिम मौका है यह साबित करने का कि भारत में लोकतंत्र अभी मरा नहीं है। जो नागरिक इस निर्णायक संघर्ष से पीछे हटेगा, वह इतिहास में उस शर्मनाक पंक्ति में खड़ा दिखेगा जहाँ लिखा होगा—”जब लोकतंत्र खतरे में था, तब तुम चुप थे।” बिहार का चुनाव 2025 भारत के चुनावी इतिहास में एक ऐसा मोड़ साबित होने वाला है, जहाँ जनता का साहस और उसके मत की शक्ति, सत्ता की साजिशों और सिस्टम की हेराफेरी पर भारी पड़ेगी।




