भारतीय संविधान की सबसे बड़ी ताकत उसकी न्यायपालिका में निहित है, जिसे सभी नागरिकों के लिए समान न्याय सुनिश्चित करने का संरक्षक माना जाता है। लेकिन जब यही स्तंभ सत्ता के प्रति झुकाव दिखाता हुआ प्रतीत होता है और अलग-अलग समुदायों के लिए न्याय के अलग-अलग तराजू का इस्तेमाल करने लगता है, तो देश के लोकतंत्र की नींव हिल जाती है। हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा एक मुस्लिम युवक, अफ़ाक़ अहमद, के खिलाफ दर्ज मुकदमे को खारिज करने से इनकार करने का फैसला, इस गंभीर विसंगति को रेखांकित करता है।
न्यायालय की टिप्पणी— कि “व्हाट्सऐप मैसेज में कही गई अनकही बातें (unsaid words) और सूक्ष्म संकेत (subtle message) भी समुदायों के बीच दुश्मनी फैलाने के लिए पर्याप्त हैं,”—न्यायिक सख़्ती के एक नए, खतरनाक आयाम को खोलती है। इसका अर्थ यह है कि अगर किसी मुस्लिम नागरिक ने अपने भाई को धर्म के कारण फ़ँसाए जाने का संकेत भी दिया, तो उसे ‘दुश्मनी फैलाने’ के अपराध के तहत फँसाया जा सकता है। यह न्यायिक व्याख्या नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उनके मौलिक अधिकारों पर एक सर्जिकल स्ट्राइक के समान है, जहाँ अदालतों ने अब ‘इरादे’ के बजाय ‘संकेत’ के आधार पर लोगों को घेरना शुरू कर दिया है।
विडंबना और विडंबन यह है कि यही देश, यही कानून और यही न्यायालय तब गहरा मौन साध लेते हैं जब सत्ता पक्ष के नेता खुले मंच से “गोली मारो…” जैसी नफरती और खूनी बातें कहते हैं, जब सार्वजनिक सभाओं में मुसलमानों को सबक सिखाने की खुली धमकियां दी जाती हैं, या जब टेलीविज़न स्टूडियो में उन्हें “घुसपैठिया” या “जनसंख्या बम” कहकर कलंकित किया जाता है। ऐसे स्पष्ट, ज़ोरदार और सार्वजनिक बयानों पर, जो सीधे तौर पर हिंसा और नफरत को उकसाते हैं, न तो किसी न्यायालय को कोई ‘subtle message’ दिखता है, न कानून का कान बहरा होता है, और न ही सत्ताधारी नेताओं पर कोई FIR दर्ज होती है।
अफ़ाक़ अहमद का मामला इसका एक क्रूर उदाहरण है: उनका भाई आरिफ़ एक झूठे ‘लव जिहाद’ और ‘धर्मांतरण’ के आरोप में फँसाया गया, जिसके बाद अफ़ाक़ ने केवल यह लिखा कि उसके भाई को “राजनीतिक दबाव में फँसाया गया है” और उसके परिवार की रोज़ी-रोटी पर बहिष्कार का आह्वान किया गया है। इस सीधे, तथ्यपरक और पीड़ा भरे संदेश में न कोई धर्म का नाम लिया गया, न कोई नफरत भरा शब्द इस्तेमाल हुआ; फिर भी अदालत ने कहा कि “unsaid words” अपराध बन सकते हैं। यह न्याय नहीं, बल्कि चयनात्मक सख़्ती का एक भयावह प्रदर्शन है।
यह न्याय का दोहरा मापदंड, न्यायपालिका की विश्वसनीयता और देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर एक गहरा धब्बा है। एक तरफ, न्यायालय ‘संकेतों’ और ‘अनकही बातों’ में भी अपराध ढूंढ लेती है, बशर्ते आरोपी अल्पसंख्यक समुदाय से हो; और दूसरी तरफ, सत्ताधारी पार्टी के नेता जब खुले मंच से हिंसा को उकसाते हुए “गोली मारो…” या “घुसपैठियों को चुन-चुन कर निकाल देंगे” जैसे नारे लगाते हैं, तो उन पर न कोई न्यायिक टिप्पणी होती है, न कोई कड़ी कार्रवाई, और न ही अदालत का ‘unsaid word’ वाला तर्क लागू होता है। यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि भारत में ‘समानता’ अब सिर्फ एक खोखला वादा बन गया है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 यह घोषणा करता है कि “सभी नागरिक समान हैं और कानून के समक्ष समान रूप से संरक्षित हैं,” लेकिन यह न्यायिक फैसला इस संवैधानिक गारंटी को हास्यास्पद साबित करता है। यह फैसला केवल अफ़ाक़ अहमद के खिलाफ एक अन्याय नहीं है; यह उस समूचे सिस्टम का पर्दाफाश है जहां ‘न्याय’ की रोशनी अब सत्ता की परछाई में मंद पड़ने लगी है, और नागरिकों के लिए ‘समानता’ भी अब एक ‘subtle message’ की तरह है—कहीं लिखी नहीं, पर सबको महसूस होती है।
निष्कर्ष यह है कि यह फैसला न केवल मुस्लिम समुदाय के भीतर एक गहरे अविश्वास को जन्म देगा, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के सामने एक मर्मभेदी प्रश्न खड़ा करता है: क्या ‘न्याय’ अब केवल एक राजनीतिक औजार बनकर रह गया है, जिसका इस्तेमाल सत्ता अपने आलोचकों को डराने और एक समुदाय को चुप कराने के लिए करती है?
जिस देश में खुलेआम नफरत फैलाने वाले सत्ता के गलियारों में घूमते हों और एक व्यथित भाई की ‘अनकही बात’ को अपराध घोषित कर दिया जाए, वहाँ संविधान और कानून की पवित्रता सवालों के घेरे में है। न्यायपालिका को अपनी नैतिक जिम्मेदारी पर गंभीरता से विचार करना होगा, क्योंकि ऐसे फैसले न केवल अल्पसंख्यकों के मन में भय पैदा करते हैं, बल्कि वे देश की आत्मा को भी चोट पहुँचाते हैं, यह साबित करते हुए कि भारत में अब कानून का ‘कान’ बहरा नहीं, बल्कि चयनात्मक रूप से बहरा हो गया है।




