पटना, 17 अक्टूबर 2025
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए मतदान की तारीखें नज़दीक आते ही, राज्य के राजनीतिक गलियारों में एक अजीबोगरीब ‘कॉमन टेंशन’ फैल गई है। यह तनाव भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) जैसे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के प्रमुख घटकों से लेकर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और कांग्रेस के महागठबंधन खेमे तक, लगभग एक दर्जन से अधिक सीटों पर समान रूप से महसूस किया जा रहा है। इन ‘कॉमन टेंशन’ वाली सीटों की पहचान उन क्षेत्रों के रूप में हुई है, जहाँ जातिगत समीकरण, बागी उम्मीदवारों की उपस्थिति, और त्रिकोणीय मुकाबले की प्रबल संभावना ने किसी भी गठबंधन के लिए जीत को निश्चित मानने की स्थिति को लगभग समाप्त कर दिया है। चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि इन सीटों पर मामूली चूक या एक छोटी सी ‘सावधानी हटी’ तो ‘दुर्घटना घटी’ वाली स्थिति पैदा हो सकती है, जिससे न केवल चुनाव का परिणाम, बल्कि राज्य में बनने वाली सरकार का स्वरूप भी अप्रत्याशित रूप से बदल सकता है।
एनडीए के भीतर चिंता का मुख्य कारण: असंतोष और ‘मुस्लिम-मुक्त’ टिकट वितरण
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर, बीजेपी और जेडीयू दोनों ही इस कॉमन टेंशन से सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं। बीजेपी के लिए चिंता का मुख्य कारण उन सीटों पर है जहाँ उसने अपने पुराने सहयोगी या दलित/अति पिछड़ा समुदाय के नेताओं को टिकट नहीं दिया है, जिससे अंदरूनी असंतोष चरम पर है और कई बागी उम्मीदवार मैदान में उतर आए हैं। ये बागी सीधे तौर पर बीजेपी के कोर वोटों में सेंध लगा रहे हैं, जिससे ‘जीत की सुनिश्चितता’ खत्म हो रही है। वहीं, जेडीयू के लिए उन सीटों पर धुकधुकी बढ़ी है जहाँ नीतीश कुमार की घटती लोकप्रियता और उम्मीदवारों के प्रति स्थानीय जनता के असंतोष के कारण मुकाबला कांटे का हो गया है। इसके अतिरिक्त, गठबंधन द्वारा मुस्लिम समुदाय को शून्य प्रतिनिधित्व देने की रणनीति, मुस्लिम बहुल या मुस्लिम-निर्णायक सीटों पर भारी उलटफेर करा सकती है, जहाँ मुस्लिम वोट पूरी तरह से महागठबंधन के पक्ष में एकजुट होकर एनडीए की उम्मीदों को ध्वस्त कर सकते हैं, जिससे लगभग 15-20 सीटों पर तनाव चरम पर है।
महागठबंधन की बढ़ी हुई बेचैनी: एम-वाई (M-Y) समीकरण पर सेंधमारी और छोटे दलों की भूमिका
दूसरी ओर, महागठबंधन खेमे में भी बेचैनी कम नहीं है, खासकर उन सीटों पर जहाँ उनका परंपरागत मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण कमज़ोर पड़ता दिख रहा है। आरजेडी की सबसे बड़ी चिंता उन यादव बहुल सीटों पर है, जहाँ यादव समुदाय से ही कई बागी उम्मीदवार या छोटे क्षेत्रीय दलों के नेता मैदान में उतर आए हैं, जिससे वोटों का बंटवारा हो रहा है। इसके अलावा, जिन सीटों पर असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम (AIMIM) जैसे मुस्लिम केंद्रित दल सक्रिय हैं, वहाँ मुस्लिम वोटों में होने वाली किसी भी सेंधमारी से महागठबंधन की जीत सीधे खतरे में आ जाएगी। कांग्रेस और वाम दलों की सीटें भी सुरक्षित नहीं हैं, क्योंकि इन सीटों पर स्थानीय जातिगत समीकरणों की जटिलता और वोटरों के अंतिम क्षणों में पाला बदलने की आशंका ने नेताओं को बेचैन कर रखा है। महागठबंधन जानता है कि इन ‘कॉमन टेंशन’ वाली सीटों पर जीत ही उन्हें सत्ता के नज़दीक ले जा सकती है, लेकिन वहां बागी और तीसरे मोर्चे की सक्रियता ने जीत के मार्जिन को इतना कम कर दिया है कि ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’ वाली कहावत पूरी तरह चरितार्थ हो रही है।
‘कॉमन टेंशन’ वाली सीटों की पहचान: त्रिकोणीय संघर्ष और अप्रत्याशित परिणाम की आशंका
राजनीतिक पंडितों ने जिन एक दर्जन से अधिक सीटों को ‘कॉमन टेंशन’ वाली श्रेणी में रखा है, उनकी मुख्य पहचान त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय संघर्ष है। ये सीटें वो हैं जहाँ किसी भी गठबंधन को स्पष्ट 40% से अधिक वोट मिलने की उम्मीद नहीं है। इन सीटों पर जीत का अंतर अक्सर 500 से 5,000 वोटों के बीच सिमट जाता है, जिसका सीधा मतलब है कि एक बागी उम्मीदवार या एक छोटा क्षेत्रीय दल भी परिणाम को पूरी तरह से उलट सकता है। इन सीटों पर उम्मीदवारों को न केवल अपने प्रतिद्वंद्वी गठबंधन के उम्मीदवार से लड़ना पड़ रहा है, बल्कि अपने ही खेमे के असंतोष और बागीपन से भी जूझना पड़ रहा है। अंतिम दौर का मतदान और वोटरों का साइलेंट निर्णय इन सीटों पर अप्रत्याशित परिणाम ला सकता है, जिसके चलते सभी प्रमुख दलों — बीजेपी, जेडीयू, आरजेडी, और एलजेपी (रामविलास) — के शीर्ष नेतृत्व की धुकधुकी बढ़ गई है, क्योंकि इन सीटों का सामूहिक परिणाम ही बिहार की अगली सरकार की चाबी साबित हो सकता है।



