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ग़ाज़ा के मलबे में उम्मीद दफ़्न: लौटे फ़लस्तीनी राख में खोज रहे अपना वजूद, हमास बोला — हम नहीं झुकेंगे’

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गाज़ा 12 अक्टूबर 2025

ग़ाज़ा शहर अब एक ऐसा मंजर बन चुका है जिसे देखकर रूह काँप उठती है। बमबारी थम चुकी है, लेकिन ज़मीन पर जो बचा है, वह इंसानियत की पराजय का गवाह है। कभी जीवन से भरा रहने वाला ग़ाज़ा अब एक खामोश कब्रिस्तान बन गया है। घर नहीं, ढह चुकी दीवारें हैं; सड़कें नहीं, मलबे के ढेर हैं; और स्कूल नहीं, राख में बदली इमारतें हैं। अरब न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक़, जब युद्धविराम लागू हुआ और लोग घर लौटे, तो उन्हें सिर्फ़ राख और सन्नाटा मिला। वे लौटे ताकि जीवन को फिर से शुरू कर सकें, मगर जो दिखा, वह ऐसा विनाश था जिसकी कल्पना भी मुश्किल है। ग़ाज़ा सिटी के उत्तरी हिस्सों — खासकर ताल अल-हवा, अल-शती, और अल-रिमाल — में अब सिर्फ़ धूल, टूटे शव, और अनगिनत अनाथ बच्चों की चिल्लाहट सुनाई देती है।

लोगों की आंखों में जो लाचारी है, वह किसी एक देश की नहीं बल्कि पूरी दुनिया की नैतिक असफलता की कहानी कहती है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े बताते हैं कि 67,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, जबकि 1.7 लाख से ज़्यादा घायल हैं — इनमें सबसे बड़ी संख्या महिलाओं और बच्चों की है। बचाव दल लगातार मलबे से लाशें निकाल रहे हैं, लेकिन राहत और उम्मीद का कोई नामोनिशान नहीं। 9,500 से अधिक लोग अब भी लापता हैं, और कई इलाकों में अब भी ज़मीन के नीचे दबी ज़िंदगियाँ चीख़ रही हैं। यह सिर्फ़ एक शहर का नहीं, बल्कि एक पूरी सभ्यता का मलबा है — जिसे हथियारों की राजनीति और बदले की आग ने राख में बदल दिया।

इसी बीच, हमास ने एक नया और सख्त रुख अपनाते हुए साफ़ कह दिया है कि “आने वाली वार्ताएँ बेहद कठिन होंगी।” हमास के वरिष्ठ नेता हुस्साम बदरान ने अरब न्यूज़ को दिए बयान में कहा कि “हमारा संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। जिन्होंने सोचा कि युद्धविराम से हमें झुकाया जा सकता है, वे गलतफहमी में हैं। हम किसी कीमत पर अपने अस्तित्व से समझौता नहीं करेंगे।” यह बयान एक ऐसे समय आया है जब अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ — विशेषकर क़तर, मिस्र और सऊदी अरब — शांतिपूर्ण राजनीतिक समाधान खोजने की कोशिश में लगे हैं। लेकिन हमास के तेवर साफ़ संकेत देते हैं कि वह हथियार डालने या शासन छोड़ने के लिए तैयार नहीं है।

इज़राइल का दावा है कि उसने हमास की “सैन्य क्षमता को लगभग समाप्त” कर दिया है और अब वह ग़ाज़ा में मानवीय राहत पहुंचाने पर विचार कर रहा है। लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। अरब न्यूज़ और रॉयटर्स की रिपोर्ट्स बताती हैं कि ग़ाज़ा की 80% आबादी अब भी विस्थापित है, और जिन इलाकों में युद्धविराम के बाद लोग लौटे हैं, वहां अब कोई ढांचा सुरक्षित नहीं बचा। भोजन, दवाइयों और स्वच्छ पानी की भारी कमी है — अस्पतालों में बिजली नहीं, एम्बुलेंसें बंद, और अंतरराष्ट्रीय सहायता ट्रक इज़राइली जांच चौकियों पर रुके हुए हैं।

ग़ाज़ा के हालात ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति अब भी मौन है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने कहा है कि “ग़ाज़ा अब दुनिया की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी का प्रतीक बन चुका है। यहां न बच्चे सुरक्षित हैं, न बुजुर्ग, और न ही कोई उम्मीद।” फिर भी, वैश्विक ताकतें अपने हितों के हिसाब से बयान देती हैं, पर ज़मीनी हकीकत नहीं बदलती।

अमेरिका और यूरोप चाहते हैं कि हमास राजनीतिक रूप से कमजोर हो, जबकि अरब देश चाहते हैं कि फ़लस्तीन की पहचान बनी रहे। इस बीच, ग़ाज़ा के लोग सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं — अपनी ज़िंदगी, अपना घर, और अपनी आने वाली पीढ़ियाँ खोकर।

अब सवाल यह है कि क्या यह युद्धविराम सच में शांति की शुरुआत है या सिर्फ़ तूफ़ान से पहले की खामोशी। हमास ने कहा है कि वह किसी भी ऐसे सौदे को नहीं मानेगा जिसमें “उसकी आत्मरक्षा का अधिकार छीना जाए।” इसका अर्थ साफ़ है — ग़ाज़ा में स्थायी शांति तब तक असंभव है जब तक राजनीतिक और सुरक्षा ढांचे पर स्पष्ट सहमति न बन जाए।

दूसरी ओर, इज़राइल चाहता है कि हमास पूरी तरह निरस्त्र हो, जबकि हमास कहता है कि “निरस्त्रीकरण, आत्मसमर्पण नहीं बल्कि गुलामी होगी।” यही वह बिंदु है जहाँ से संघर्ष फिर भड़क सकता है।

ग़ाज़ा के पुनर्निर्माण की बातें हो रही हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि अभी न बिजली है, न ईंधन, न शासन। अरब देशों ने राहत सामग्री भेजने की कोशिश की, पर अधिकतर ट्रक सीमा पर ही रोक दिए गए।

ग़ाज़ा के लोगों के लिए अब जीवन केवल बचने का नाम है — हर दिन एक नई मौत का इंतज़ार। बच्चे ईंटों पर बैठकर अपने घर की निशानियाँ ढूंढ रहे हैं, महिलाएँ लाशों में अपने पति या बेटे की पहचान करने की कोशिश कर रही हैं, और बुजुर्ग उस मिट्टी में दुबककर रो रहे हैं जहाँ कभी उनका घर था।

ग़ाज़ा आज केवल एक भूगोल नहीं रहा, यह मानवता की परीक्षा बन चुका है। यह वह स्थान है जहाँ अंतरराष्ट्रीय राजनीति के झूठे आदर्श धराशायी हो चुके हैं। यह वह धरती है जहाँ इंसान की सबसे बड़ी हार दर्ज की गई — जहाँ युद्ध ने न केवल जीवन छीन लिया, बल्कि उम्मीद भी मार दी।

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