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3.7 करोड़ नाम हटे, मताधिकार पर सवाल — 91 साल की औरत लाइन में, लोकतंत्र कटघरे में

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महेंद्र कुमार | नई दिल्ली | 30 दिसंबर 2025

SIR पर सियासी और सामाजिक हलचल

लोकतंत्र की असली परीक्षा कानूनों और प्रक्रियाओं की लंबी सूची से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वही व्यवस्था सबसे कमजोर आदमी के साथ कैसा व्यवहार करती है। 91 वर्षीय अशतला भट्टाचार्य की कहानी आज इसी कसौटी पर हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करती है। जो बुजुर्ग न ठीक से चल सकते हैं, न देर तक खड़े रह सकते हैं—और जिनकी उम्र आज़ाद भारत के इतिहास से भी लंबी है—उन्हें स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत दस्तावेज़ी “शक” के नाम पर लाइन में खड़ा किया गया। चुनाव आयोग के समन में उन्हें ‘संदिग्ध’ की तरह देखा गया, यहां तक कि घुसपैठिया होने का संकेत भी दिया गया। यहीं से सवाल उठता है कि क्या आज के भारत में एक 91 साल की मतदाता को भी पहले खुद को निर्दोष साबित करना पड़ेगा?

देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सियासी और सामाजिक हलचल तेज हो गई है। चुनाव आयोग के अनुसार 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में करीब 3.7 करोड़ नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटाने के लिए चिन्हित किए गए हैं। आयोग का कहना है कि यह फर्जी, मृत और डुप्लीकेट नामों को हटाने की प्रक्रिया है, लेकिन आलोचकों को आशंका है कि इस कवायद की आड़ में बड़ी संख्या में असली और योग्य मतदाता भी बाहर हो सकते हैं।

योगेंद्र यादव का सवाल: खामी अमल में नहीं, प्रक्रिया के डिजाइन में

सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने SIR की मौजूदा प्रक्रिया पर बुनियादी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि समस्या केवल इसे लागू करने के तरीके की नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया के डिजाइन की है। असम और उत्तर प्रदेश के उदाहरण बताते हैं कि SIR को हर राज्य में एक समान रूप से लागू नहीं किया गया। असम में घर-घर जाकर साधारण सत्यापन किया गया, न नागरिकता के काग़ज़ मांगे गए और न जटिल औपचारिकताएं थोपी गईं। यही वजह है कि वहां बड़े पैमाने पर नाम कटने की शिकायत सामने नहीं आई।

उत्तर प्रदेश में आंकड़ों का गंभीर विरोधाभास

उत्तर प्रदेश में स्थिति बिल्कुल उलट दिखाई देती है। यहां SIR के बाद बनी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में केवल 12.6 करोड़ मतदाता दर्ज हैं, जबकि स्थानीय निकाय चुनावों के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की सूची में 16.1 करोड़ मतदाता मौजूद हैं। यह आंकड़ा राज्य की वयस्क आबादी के लगभग बराबर है। दोनों सूचियों के बीच करीब साढ़े तीन करोड़ नामों का अंतर इस आशंका को और गहरा करता है कि कहीं बड़ी संख्या में मतदाता व्यवस्था की खामियों के कारण सूची से बाहर तो नहीं कर दिए गए।

कांग्रेस की आपत्ति: सबसे ज्यादा खतरे में गरीब और प्रवासी

कांग्रेस पार्टी ने SIR की प्रक्रिया को लेकर तीखी आपत्ति जताई है। पार्टी का कहना है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण जनगणना जैसा संवेदनशील कार्य है और इसे अत्यंत सावधानी, पारदर्शिता और मानवीय दृष्टिकोण के साथ किया जाना चाहिए। कांग्रेस के अनुसार मतदाता बनने के लिए नागरिकता, 18 वर्ष की आयु और उस क्षेत्र में सामान्य निवास आवश्यक है, लेकिन ‘ऑर्डिनरी रेजिडेंट’ की अस्पष्ट परिभाषा के कारण प्रवासी मजदूरों, गरीबों और हाशिये पर खड़े तबकों के नाम कटने का खतरा सबसे अधिक है।

राज्यों में अलग-अलग अनुभव, अलग-अलग असर

रिपोर्ट्स के मुताबिक उत्तर प्रदेश में करीब 19 प्रतिशत नाम कटने की आशंका जताई जा रही है, जबकि पश्चिम बंगाल में सत्यापन केंद्रों पर लंबी कतारें देखी गई हैं और 85 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों के लिए घर पर सत्यापन जैसी राहतें दी गई हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता जनवरी की शुरुआत तक ड्राफ्ट सूची में नाम कटने के फैसले को चुनौती दे सकते हैं, जबकि अंतिम वोटर लिस्ट 7 फरवरी तक जारी होने की संभावना है।

लोकतंत्र के सामने खड़ा निर्णायक सवाल

इस पूरे विवाद के बीच सबसे अहम सवाल अब और स्पष्ट हो गया है—क्या वोटर लिस्ट सुधार के नाम पर लोकतंत्र की सबसे बुनियादी ताकत, यानी मताधिकार, को कमजोर किया जा रहा है? विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि अभी भी समय है और चुनाव आयोग को इस प्रक्रिया की मानवीय, पारदर्शी और संवैधानिक समीक्षा करनी चाहिए, ताकि कोई भी योग्य आदमी—खासकर बुजुर्ग, गरीब और कमजोर वर्ग—अपने वोट के अधिकार से वंचित न रह जाए।

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