भारत में लोकतंत्र की थकान — जब जनता बोलती नहीं, सत्ता बेलगाम हो जाती है
भारत का लोकतंत्र अब किसी जीवंत प्राणवान विचार की तरह नहीं, बल्कि एक थके हुए अनुष्ठान की तरह दिखाई देता है। संविधान आज भी हमारे पास है, मगर उसकी आत्मा जैसे धुंधलाती जा रही है। हर पाँच साल पर चुनाव होते हैं, भाषणों की गूंज सुनाई देती है, मंच सजते हैं, नारों की बारिश होती…
