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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष: विचार, संघर्ष और परिवर्तन की सदी

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डॉ. शालिनी अली, समाजसेवीनई दिल्ली 2 अक्टूबर 2025

सौ वर्षों का अद्भुत सफ़र

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। उस समय यह संगठन मात्र कुछ स्वयंसेवकों के साथ शुरू हुआ था, जिसका उद्देश्य हिंदू समाज को एकजुट करना और राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण करना था। सौ वर्ष पूरे करते-करते RSS केवल भारत का नहीं, बल्कि विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बन चुका है। इसके कार्यकर्ताओं ने समाज, राजनीति, शिक्षा, सेवा, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्र निर्माण के लगभग हर क्षेत्र में अपनी गहरी छाप छोड़ी है। RSS के 100 वर्षों का यह सफर केवल संगठन की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत के सामाजिक–राजनीतिक इतिहास का भी जीवंत दस्तावेज़ है।

स्थापना की पृष्ठभूमि और हेडगेवार का दृष्टिकोण

1920 के दशक में भारत गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। एक ओर स्वतंत्रता संग्राम चल रहा था, दूसरी ओर समाज आंतरिक विभाजनों—जातिवाद, अस्पृश्यता, सांप्रदायिकता और विदेशी मानसिकता—से पीड़ित था। डॉ. हेडगेवार ने देखा कि जब तक समाज संगठित और अनुशासित नहीं होगा, तब तक स्वतंत्रता अधूरी रहेगी। इस विचार से प्रेरित होकर उन्होंने RSS की नींव रखी। संघ का लक्ष्य केवल राजनीतिक आज़ादी तक सीमित नहीं था, बल्कि एक सशक्त, संगठित और आत्मनिर्भर समाज का निर्माण करना था। हेडगेवार का सपना था—“भारत को हिंदू राष्ट्र के रूप में पुनर्स्थापित करना, जहाँ संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रीय चेतना साथ-साथ चलें।”

प्रारंभिक वर्ष और संगठनात्मक ढांचा

RSS ने अपने प्रारंभिक वर्षों में राजनीतिक संघर्षों में सीधे भाग नहीं लिया। इसका फोकस “शाखा” पद्धति के माध्यम से युवाओं में अनुशासन, सेवा और संगठन की भावना पैदा करने पर रहा। शाखा में स्वयंसेवक सुबह-सुबह एकत्रित होते, शारीरिक व्यायाम, देशभक्ति गीत, खेल और चर्चा करते। यह साधारण-सी प्रक्रिया समय के साथ एक क्रांतिकारी सामाजिक प्रयोग सिद्ध हुई। यह अनुशासन और राष्ट्रीयता की भावना पीढ़ी दर पीढ़ी कार्यकर्ताओं में समाहित होती गई।

संघ और स्वतंत्रता आंदोलन

RSS के शुरुआती दिनों को लेकर अक्सर यह बहस होती है कि संगठन ने स्वतंत्रता आंदोलन में क्या भूमिका निभाई। आलोचक कहते हैं कि RSS ने सीधे आंदोलनों में भाग नहीं लिया, जबकि समर्थकों का कहना है कि RSS का लक्ष्य दीर्घकालिक था—भारत के लिए एक सशक्त सामाजिक आधार तैयार करना। यह सच है कि हेडगेवार और बाद में गोलवलकर (गुरुजी) जैसे नेताओं ने कांग्रेस के आंदोलनों में सीधे भाग लेने के बजाय संगठन निर्माण को प्राथमिकता दी। लेकिन इसके कार्यकर्ता व्यक्तिगत स्तर पर कई स्वतंत्रता आंदोलनों में शामिल रहे।

डॉ. हेडगेवार से गुरुजी तक: विचारधारा का विस्तार

1940 में हेडगेवार के निधन के बाद माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) संघ के सरसंघचालक बने। उनके नेतृत्व में संघ का विस्तार अभूतपूर्व हुआ। गुरुजी ने स्पष्ट किया कि RSS का लक्ष्य केवल हिंदू समाज को संगठित करना है और इसके लिए राजनीति, सेवा और सांस्कृतिक क्षेत्रों में व्यापक प्रसार आवश्यक है। गुरुजी के समय में ही संघ का नेटवर्क पूरे देश में फैलने लगा और विभिन्न मोर्चों पर संगठन खड़े किए गए।

विभाजन, स्वतंत्रता और RSS की भूमिका

1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ और विभाजन हुआ, तब RSS ने लाखों शरणार्थियों की सेवा की। पंजाब, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में RSS स्वयंसेवकों ने राहत शिविर चलाए, भोजन–पानी की व्यवस्था की और विस्थापित परिवारों को बसाने का काम किया। यह वह दौर था जब संघ की सेवा भावना ने आम जनता के दिलों में गहरी जगह बनाई। हालांकि महात्मा गांधी की हत्या के बाद 1948 में RSS पर प्रतिबंध लगा, लेकिन 1949 में प्रतिबंध हटने के बाद संघ और भी मजबूत होकर उभरा।

1950–70 का दौर: सेवा और राष्ट्रवाद का प्रसार

स्वतंत्रता के बाद RSS ने सेवा कार्यों को अपना प्रमुख मिशन बनाया। वनवासी कल्याण आश्रम, विद्यार्थी परिषद, विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठन RSS की प्रेरणा से खड़े हुए। शिक्षा, संस्कृति और ग्रामीण विकास में RSS ने जड़ें जमाना शुरू कीं। इसी दौर में जनसंघ (बाद में भारतीय जनता पार्टी) RSS की राजनीतिक धारा के रूप में सामने आया।

आपातकाल और संघ की परीक्षा

1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल ने RSS को सबसे बड़ी परीक्षा के दौर में डाल दिया। संघ पर प्रतिबंध लगा, हज़ारों कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया। लेकिन इसी दमन के दौरान RSS ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए बड़ी भूमिका निभाई। जब 1977 में आपातकाल खत्म हुआ और जनता पार्टी सत्ता में आई, तो RSS की छवि लोकतंत्र रक्षक संगठन के रूप में उभरी।

1980–2000: भाजपा का उदय और रामजन्मभूमि आंदोलन

इस काल में RSS की राजनीतिक धारा भारतीय जनता पार्टी के रूप में तेज़ी से बढ़ी। 1990 के दशक में रामजन्मभूमि आंदोलन ने संघ और उसके सहयोगी संगठनों को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया। लाखों स्वयंसेवकों ने इसमें हिस्सा लिया। 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी, जिसने RSS को प्रत्यक्ष राजनीतिक प्रभाव दिलाया।

21वीं सदी: सेवा से राजनीति तक RSS का प्रभाव

आज RSS केवल एक संगठन नहीं, “संघ परिवार” है। शिक्षा में विद्या भारती, श्रमिक वर्ग में भारतीय मजदूर संघ, छात्रों में ABVP, महिला संगठन, सेवा कार्य, मीडिया, थिंक टैंक—हर क्षेत्र में RSS की उपस्थिति है। 2014 और 2019 में भाजपा की ऐतिहासिक जीत और नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना RSS के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जाती है।

आलोचना और विवाद

RSS पर आरोप भी लगे हैं—सांप्रदायिकता फैलाने, अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेलने और हिंदुत्व की संकीर्ण व्याख्या करने के। आलोचक कहते हैं कि RSS गांधी की हत्या के बाद हमेशा संदेह के घेरे में रहा। लेकिन समर्थकों का कहना है कि RSS “हिंदुत्व” को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में देखता है, न कि सांप्रदायिक विभाजन के रूप में।

सेवा, शिक्षा और आधुनिक भारत में RSS की भूमिका

आज RSS का सबसे बड़ा काम है—सेवा। बाढ़, भूकंप या महामारी—हर जगह संघ के स्वयंसेवक सबसे आगे खड़े होते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में लाखों विद्यार्थी संघ प्रेरित स्कूलों से पढ़ रहे हैं। स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और सामाजिक एकता को बढ़ावा देना RSS का मूल एजेंडा है।

100 वर्षों का सार और भविष्य की दिशा

RSS का यह 100 वर्षों का सफर बताता है कि कैसे एक छोटे संगठन ने समाज की गहराई में अपनी जड़ें जमा लीं। आज RSS को चुनौती है—भारत की विविधता और बहुलता को अपने विचार से संतुलित करना। आने वाले समय में संघ का असली परीक्षण यही होगा कि वह अपने राष्ट्रवाद को समावेशी और प्रगतिशील दिशा में कैसे ले जाता है।

एक सदी का सफर, आने वाली सदियों की जिम्मेदारी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष केवल एक संगठन की उपलब्धि नहीं हैं, बल्कि यह भारत के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा हैं। इसकी जड़ें गाँव-गाँव तक फैली हैं और इसकी शाखाएँ करोड़ों जीवनों को प्रभावित करती हैं। आलोचना हो या प्रशंसा, RSS को नज़रअंदाज़ करना अब संभव नहीं। गांधी ने कहा था, “भारत आत्मा का देश है।” शायद यही कारण है कि RSS ने अपनी यात्रा को हमेशा “राष्ट्र की आत्मा” से जोड़ा है।

सवाल यह है कि आने वाले 100 वर्षों में संघ अपने विचारों को किस दिशा में ले जाएगा—क्या वह एक समावेशी, प्रगतिशील और आधुनिक भारत का निर्माता बनेगा या केवल अतीत की परंपराओं में अटककर रह जाएगा?

RSS और सामाजिक सुधार आंदोलनों की भूमिका

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल शाखाओं और संगठन निर्माण तक सीमित नहीं रहा। उसने सामाजिक सुधार के अनेक मोर्चों पर काम किया। स्वतंत्रता के बाद जब समाज जातिवाद, अस्पृश्यता और भेदभाव से जूझ रहा था, RSS ने “एकात्म मानववाद” और “समरसता” की धारणा को आगे बढ़ाया। संघ के कार्यकर्ताओं ने दलित बस्तियों में जाकर सेवा की, मंदिरों के द्वार सभी जातियों के लिए खुले रखने के अभियान चलाए और सामाजिक मेल-मिलाप के कार्यक्रम आयोजित किए। संघ के अनेक सरसंघचालकों ने साफ कहा कि हिंदू समाज अगर विभाजित रहेगा तो राष्ट्र की शक्ति कभी संगठित नहीं होगी। 1980 और 1990 के दशक में संघ की शाखाओं ने शिक्षा और स्वास्थ्य को ग्रामीण इलाकों तक पहुँचाने का अभियान चलाया। “सेवा भारती” और “वनवासी कल्याण आश्रम” जैसी संस्थाएँ आदिवासी और पिछड़े वर्गों में शिक्षा और स्वावलंबन का काम कर रही हैं। यह पहल दिखाती है कि RSS अपने सामाजिक सुधार कार्यों को केवल वैचारिक दायरे तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे ज़मीन पर लागू भी करता है।

RSS की प्रेरणा से बने अंतरराष्ट्रीय संगठन

RSS की पहुँच अब केवल भारत तक नहीं रही। पिछले चार दशकों में संघ की प्रेरणा से कई अंतरराष्ट्रीय संगठन खड़े हुए हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और खाड़ी देशों में HSS (Hindus Swayamsevak Sangh) नाम से संगठन काम कर रहे हैं। ये संगठन भारतीय संस्कृति और हिंदू मूल्यों को दुनिया में फैलाने के साथ-साथ स्थानीय समाज में सेवा कार्य भी करते हैं। अमेरिका में HSS ने कोविड-19 महामारी के दौरान अस्पतालों और समुदायों में राहत सामग्री बाँटी। ब्रिटेन में इसके स्वयंसेवक भारतीय मूल के युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम कर रहे हैं। संघ की यह अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी बताती है कि यह केवल एक भारतीय संगठन नहीं, बल्कि एक वैश्विक सांस्कृतिक आंदोलन बन चुका है। इससे भारतीय प्रवासी समुदाय को एक पहचान और सामूहिक शक्ति मिलती है।

आलोचनाओं और उन पर RSS का जवाब

RSS पर हमेशा आलोचना होती रही है। आलोचक कहते हैं कि यह संगठन अल्पसंख्यकों को हाशिए पर डालता है और सांप्रदायिकता फैलाता है। गांधी की हत्या के बाद भी संघ पर प्रतिबंध लगा और तब से इसे संदेह की निगाह से देखा जाता रहा है। लेकिन RSS हमेशा यह कहता आया है कि वह “हिंदुत्व” को किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में देखता है। संघ का मानना है कि भारत की आत्मा उसकी संस्कृति और परंपरा में है, और यह सभी धर्मों और समुदायों को सम्मान देती है।

संघ की दूसरी बड़ी आलोचना यह है कि यह महिलाओं को पीछे रखता है। इस पर संघ ने “राष्ट्र सेविका समिति” जैसी इकाई खड़ी कर जवाब दिया, जहाँ महिलाएँ नेतृत्व की भूमिका निभाती हैं। संघ का कहना है कि उसका ढाँचा लचीला है और वह समाज की बदलती ज़रूरतों के हिसाब से खुद को ढाल सकता है। इस तरह, आलोचनाओं के बावजूद RSS ने अपने काम और सेवा कार्यों से अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी है।

RSS की आधुनिक तकनीक और डिजिटल विस्तार की योजनाएँ

21वीं सदी में RSS ने भी समय के साथ चलना सीखा है। कभी केवल शाखाओं और मौखिक संवाद पर निर्भर रहने वाला संगठन अब डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म का व्यापक उपयोग कर रहा है। संघ से जुड़े संगठन सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और युवाओं तक पहुँचने के लिए नई तकनीक अपना रहे हैं। “स्वयंसेवक” ऐप, डिजिटल शाखाएँ और ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम RSS की नई दिशा को दिखाते हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान संघ ने ऑनलाइन शाखाओं का प्रयोग किया और हजारों युवाओं को जोड़े रखा। अब संघ का फोकस है कि तकनीक का इस्तेमाल केवल प्रचार के लिए न हो, बल्कि शिक्षा, सेवा और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ाने के लिए हो। आने वाले वर्षों में RSS अपने डिजिटल विंग को और मजबूत करने जा रहा है ताकि वह नई पीढ़ी को जोड़ सके और अपनी विचारधारा को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत कर सके।

100 साल पूरे होने पर RSS के समारोह और संकल्प

1925 में शुरू हुआ यह संगठन 2025 में अपने सौ वर्ष पूरे कर रहा है। इस अवसर पर RSS देशभर में बड़े पैमाने पर कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। शाखाओं से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक “शताब्दी समारोह” की तैयारियाँ चल रही हैं। इस दौरान संघ अपने सौ वर्षों के काम का लेखा-जोखा प्रस्तुत करेगा और आने वाले सौ वर्षों की दिशा भी तय करेगा। संकल्प पत्र में ग्रामीण विकास, आत्मनिर्भर भारत, शिक्षा सुधार, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रीय एकता जैसे विषय प्रमुख रहेंगे। संघ का यह भी प्रयास रहेगा कि वह आलोचनाओं को समझकर अपने आप को और समावेशी बनाए। शताब्दी समारोह का सबसे बड़ा संदेश यही होगा कि संघ अब केवल संगठन नहीं, बल्कि एक “राष्ट्रीय आंदोलन” है, जिसने भारत की राजनीति और समाज दोनों को गहराई से प्रभावित किया है।

सदी से अगली सदी तक का सफर

RSS के 100 वर्ष केवल अतीत की उपलब्धियों का जश्न नहीं, बल्कि भविष्य की जिम्मेदारी का एहसास भी है। यह संगठन अब ऐसे मुकाम पर है जहाँ उसकी हर पहल और हर कदम का असर पूरे देश पर पड़ता है। आने वाले वर्षों में संघ के सामने चुनौती होगी कि वह परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन कैसे साधे, और राष्ट्रवाद को समावेशी और प्रगतिशील कैसे बनाए। सौ वर्षों का यह सफर बताता है कि RSS ने भारत के सामाजिक–राजनीतिक जीवन में गहरी छाप छोड़ी है। अब आने वाली सदी यह तय करेगी कि यह संगठन केवल भारत तक सीमित रहता है या पूरी दुनिया के लिए “सांस्कृतिक मार्गदर्शक” बनकर उभरता है।

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