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100% टैरिफ’: ट्रंप ने यूरोपीय संघ से रूस से तेल खरीदने वाले देशों भारत और चीन पर उच्च शुल्क लगाने को कहा — रिपोर्ट

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वाशिंगटन 10 सितंबर 2025

ट्रंप का आक्रामक प्रस्ताव:

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोपीय संघ (EU) से आग्रह किया है कि वह रूस से तेल खरीदने वाले देशों, खासकर भारत और चीन, पर 100% तक टैरिफ लगाए। इस कदम का उद्देश्य रूस को युद्ध वित्तीय सहायता पहुंचाने से रोकना है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप ने EU अधिकारियों से कहा कि यदि वे इस प्रस्ताव पर सहमत होते हैं, तो अमेरिका भी समान कदम उठा सकता है।

भारत और चीन पर अतिरिक्त शुल्क:

इस प्रस्ताव के तहत, भारत और चीन जैसे देशों पर 50% से 100% तक अतिरिक्त शुल्क लगाने की योजना है। अमेरिका का तर्क है कि इन देशों द्वारा रूस से तेल खरीदने से रूस की युद्ध गतिविधियों को वित्तीय समर्थन मिलता है। अधिकारियों का कहना है कि यदि इन देशों की तेल खरीद पर कड़ा कदम नहीं उठाया गया, तो रूस की युद्ध मशीनरी को रोकना संभव नहीं होगा।

अमेरिकी वित्तीय दबाव और सहयोग:

अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने भी यूरोपीय संघ से आग्रह किया है कि वह रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क और प्रतिबंध लगाए। उनका कहना है कि इस कदम से रूस की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से प्रभावित किया जा सकता है। अमेरिका ने पहले ही भारत पर रूस से तेल खरीदने के कारण 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया है, और यूरोपीय संघ का समर्थन इस प्रयास को और प्रभावी बना सकता है।

भारत की कड़ी प्रतिक्रिया:

हालांकि, भारत ने इस प्रस्ताव को खारिज किया है। भारत का कहना है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस से तेल खरीद जारी रखेगा और यह कदम उसके राष्ट्रीय हितों के अनुरूप है। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह किसी भी बाहरी दबाव के सामने नहीं झुकेगा और अपने निर्णय स्वतंत्र रूप से लेगा।

वैश्विक व्यापार पर असर:

इस प्रस्ताव के लागू होने से वैश्विक व्यापार में तनाव बढ़ सकता है और प्रमुख वैश्विक शक्तियों के बीच आर्थिक संबंध प्रभावित हो सकते हैं। यदि यूरोपीय संघ और अन्य देश इस प्रस्ताव का समर्थन करते हैं, तो यह रूस के लिए आर्थिक दबाव बढ़ा सकता है, लेकिन साथ ही भारत और चीन जैसे देशों के साथ उनके व्यापारिक संबंधों में भी बदलाव ला सकता है।

ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता:

अमेरिका और यूरोपीय संघ के इस कदम से वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अनिश्चितता बढ़ सकती है। विकासशील देशों को ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता बनाए रखने में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, और वैश्विक तेल मूल्य में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

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