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वक्फ विधेयक से पसमांदा मुसलमानों को मिलेगा अधिकार और सम्मान: जगदंबिका पाल

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2 अप्रैल 2025 | नई दिल्ली | 

लोकसभा में प्रस्तुत वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 पर बोलते हुए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के अध्यक्ष और वरिष्ठ सांसद जगदंबिका पाल ने एक ऐतिहासिक वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि यह विधेयक केवल संपत्तियों के प्रबंधन का नहीं, बल्कि पसमांदा मुसलमानों, गरीबों, विधवाओं और वंचितों को उनका हक लौटाने का माध्यम है। उन्होंने इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए “सुधार की मशाल” बताया, जिसने लंबे समय से वक्फ बोर्डों पर एकाधिकार जमाए लोगों की सत्ता को चुनौती दी है।

जगदंबिका पाल ने बताया कि JPC ने इस विधेयक पर देशभर में 38 बैठकें आयोजित कीं, जिनमें 284 संगठनों, धार्मिक प्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों से गहन संवाद किया गया। उन्होंने कहा कि “हमने आठ–आठ घंटे बैठकर सबकी बात सुनी। यह विधेयक हड़बड़ी में नहीं, एक समावेशी विमर्श के बाद बना है।” उनके अनुसार, यही लोकतंत्र की ताकत है—जहां बहस और संवाद से एक संतुलित समाधान निकलता है।

पाल ने इस विधेयक के मुख्य प्रावधानों की सराहना करते हुए कहा कि इससे वक्फ संपत्तियों की डिजिटल मैपिंग, CAG द्वारा ऑडिट, ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट तक अपील की व्यवस्था, और बोर्डों में महिलाओं, पसमांदा, शिया–सुन्नी, ओबीसी और गैर-मुस्लिम विशेषज्ञों की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि वक्फ बोर्ड अब धार्मिक सत्ता के खेल का मैदान नहीं रहेंगे, बल्कि आम मुसलमानों की भलाई का संस्थान बनेंगे।

अपने भाषण में जगदंबिका पाल ने यह भी कहा कि वक्फ की सच्चाई यही है कि करोड़ों की संपत्ति होते हुए भी गरीब मुसलमान झोपड़ियों में रह रहे हैं, क्योंकि उनकी भलाई के लिए बनाई गई व्यवस्था कुछ लोगों की जागीर बन गई थी। उन्होंने दो टूक कहा, “अब इस जागीरदारी पर लगाम लगेगी। यह बिल उस मुसलमान के लिए है, जो सुबह ताड़ी बेचता है, शाम को रिक्शा चलाता है और रात को अल्लाह से दुआ करता है कि उसके बच्चों को स्कूल भेज सके।”

पाल ने उन आलोचकों को भी आड़े हाथों लिया जो इसे धर्म के खिलाफ बता रहे थे। उन्होंने कहा कि “वक्फ एक प्रशासनिक संस्था है, कोई धर्म नहीं। यह विधेयक वक्फ की व्यवस्था को धर्म से मुक्त कर न्याय और पारदर्शिता से जोड़ता है।” उन्होंने AIMPLB )ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड) द्वारा मस्जिदों में विरोध जताने के आह्वान को “भ्रम फैलाने की साजिश” करार दिया और कहा कि “जो लोग सच्चाई से डरते हैं, वही इस सुधार से घबरा रहे हैं।”

जगदंबिका पाल का यह बयान न केवल वक्फ विधेयक की संवैधानिक और सामाजिक वैधता को बल देता है, बल्कि यह भी साफ करता है कि यह कानून मुसलमानों के अधिकारों का हनन नहीं, बल्कि उनकी हकदारी का दस्तावेज़ है। जब यह विधेयक कानून का रूप लेगा, तब यह साबित होगा कि लोकतंत्र में कानून वही होता है जो वंचित की आवाज़ को न्याय में बदल दे। वक्फ विधेयक अब केवल एक संशोधन नहीं, बल्कि पसमांदा मुसलमानों के सम्मान की बहाली का युगांतकारी दस्तावेज़ बन चुका है।

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