अवधेश कुमार । नई दिल्ली 28 नवंबर 2025
देश की राजधानी और उसके आसपास प्रदूषण का संकट हर साल खतरनाक स्तर पर पहुंच रहा है, लेकिन इस बार स्थिति और विचलित करने वाली है — क्योंकि सरकार की नीतियां, फैसले और बयानों में एक ऐसा विरोधाभास दिख रहा है जो केवल शासन की दिशाहीनता ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों की अनदेखी को भी उजागर करता है। जहां सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत जैसे शीर्ष संवैधानिक पदाधिकारी खुले मंच से कह रहे हैं कि “सुबह एक घंटे टहलने से प्रदूषण ने मेरी तबियत बिगाड़ दी”, वहीं केन्द्र और दिल्ली सरकारें दावा कर रही हैं कि वायु गुणवत्ता सुधर रही है और खतरा कम हो रहा है। ये दो दृष्टिकोण टकराते नहीं, बल्कि यह दिखाते हैं कि जमीनी हकीकत क्या है और सत्ता के गलियारों में बैठकर तैयार किए जा रहे ‘कागज़ी आंकड़े’ क्या कहते हैं।
पहली खबर इस विरोधाभास को सीधा उजागर करती है। सीजेआई सूर्यकांत ने प्रदूषण की भयावहता इतनी स्पष्ट रूप से महसूस की कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही को वर्चुअल मोड में शिफ्ट करने तक की बात कह दी। उन्होंने माना कि टहलने के दौरान ही उनकी तबियत बिगड़ने लगी। यह सिर्फ एक न्यायाधीश की परेशानी नहीं है — यह करोड़ों दिल्लीवासियों की रोज़मर्रा की पीड़ा है, लेकिन इसके बावजूद सरकार ‘प्रदूषण कम हो गया’ जैसी सफ़ाई देती रहती है। शीर्ष न्यायपालिका और सरकार के बीच यह अंतर सिर्फ तथ्यों का नहीं है, बल्कि संवेदनशीलता और वास्तविकता को स्वीकारने की क्षमता का है।
दूसरी खबर सरकार के इस असंगत रवैये को और उजागर करती है। दिल्ली-एनसीआर में लागू ग्रैप-3 की पाबंदियां अचानक हटाने का फैसला यह दिखाता है कि सरकार प्रशासनिक निर्णयों को वैज्ञानिक सलाह, स्वास्थ्य चेतावनियों और विशेषज्ञों की राय से ऊपर रखकर मनमानी कर रही है। अगर सीजेआई जैसे वरिष्ठ नागरिक की हालत सिर्फ सुबह की सैर से बिगड़ जाती है, तो क्या सरकार का यह दावा सही है कि वायु गुणवत्ता ‘सामान्य’ हो रही है? यदि प्रदूषण वास्तव में कम हुआ होता, तो पाबंदियां हटाने का सवाल तार्किक होता, लेकिन वर्तमान एअर क्वालिटी इंडेक्स और चिकित्सकीय चेतावनियां इसके उलट दिशा में इशारा कर रही हैं। यह फैसला दिखाता है कि प्रशासन गंभीर संकट को भी केवल ‘व्यवहारिक बोझ’ मानकर जनता की सुरक्षा को गौण कर देता है।
तीसरी खबर इस विरोधाभासी नीति का सबसे खतरनाक चेहरा उजागर करती है: अरावली पहाड़ियों से 90% हरित सुरक्षा-कवच हटाने का निर्णय। वन सर्वेक्षण ऑफ इंडिया ने स्पष्ट कहा था कि कम ऊंचाई वाली ये पहाड़ियाँ दिल्ली की ओर आने वाली धूल और रेतीले तूफानों की प्राकृतिक ढाल हैं। इन्हीं अरावली ने सदियों से NCR को रेगिस्तान में बदलने से रोके रखा है। लेकिन केन्द्र सरकार ने 100 मीटर की कटी-पेस्ट ऊंचाई सीमा तय कर 90% अरावली को गैर-हिल घोषित कर दिया, जिससे खनन, निर्माण, रियल-एस्टेट और तमाम विनाशकारी गतिविधियों के दरवाजे खुल गए। यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं है — यह दिल्ली की सांस छीनने का सरकारी निर्णय है। जिस समय दुनिया भर में सरकारें हरित आवरण बढ़ाने में लगी हैं, भारत में सरकार संरक्षित पहाड़ियों को ही नष्ट करने पर उतारू है।
चौथी खबर देश के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान AIIMS की चेतावनी को रेखांकित करती है: वायु प्रदूषण गर्भ में पल रहे बच्चों तक को बीमार बना रहा है। डॉक्टर स्पष्ट कह रहे हैं कि प्रदूषण का असर जन्म से पहले शुरू हो जाता है — मां की सांस में जा रहा ज़हर सीधे भ्रूण तक पहुंचता है, जिससे जन्मजात बीमारियां, अस्थमा, कमजोर प्रतिरोधक क्षमता और दीर्घकालिक रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। यह कोई राजनीतिक बहस नहीं — यह विज्ञान और चिकित्सा की चेतावनी है। लेकिन यह बेहद चिंताजनक है कि सरकार AIIMS जैसे संस्थानों की गंभीर सलाह को भी नज़रअंदाज़ कर रही है। यदि किसी विकसित देश में ऐसा वैज्ञानिक इनपुट आता, तो सरकारें तत्काल आपातकालीन उपाय लागू करतीं, मीडिया सरकार से सवालों की बौछार करती और जनता सड़कों पर उतर आती। लेकिन भारत में स्थिति उलट है — यहां समस्या से ज़्यादा महत्वपूर्ण ‘विवाद’ बना दिए जाते हैं।
इन चार खबरों का सार यही है कि सरकार की प्राथमिकताएं नागरिकों के “स्वास्थ्य, गरिमा, समानता और निरोगी जीवन” पर नहीं, बल्कि धार्मिक प्रतीकों, राजनीतिक लाभ और आर्थिक दबावों पर केंद्रित हो गई हैं। यह विडंबना है कि देश की राजधानी जहरीली गैस चेंबर बन चुकी है, बच्चे गर्भ में बीमार हो रहे हैं, पहाड़ियां काटी जा रही हैं, कोर्ट तक लगातार चेतावनी दे रहा है — लेकिन सरकार का प्रशासनिक नैरेटिव सिर्फ यह कहने में बीत रहा है कि “सब ठीक है।” लोकतंत्र में सरकार का काम धर्म की ध्वजा फहराना नहीं, बल्कि संविधान के अनुसार नागरिकों के जीवन की रक्षा करना है। कल्याणकारी राज्य वही होता है जो नागरिक की सांस को, उसके भविष्य को और उसके पर्यावरण को सबसे ऊपर रखे — और दुर्भाग्य से इन चार खबरों से साफ़ दिखता है कि मौजूदा व्यवस्था इस दिशा से लगातार दूर होती जा रही है।




