अमनप्रीत सिंह | चंडीगढ़ 25 दिसंबर 2025
पंजाब में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को लेकर सियासी तापमान एक बार फिर तेज होने जा रहा है। पंजाब कांग्रेस ने ऐलान किया है कि वह 5 जनवरी से पूरे प्रदेश में मनरेगा को लेकर व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू करेगी। यह आंदोलन उन लाखों ग्रामीण परिवारों की आवाज़ बनने का दावा करता है, जिनके लिए मनरेगा रोज़गार नहीं, बल्कि जीविका और सम्मान का सहारा रही है।
कांग्रेस का कहना है कि राज्य में अब हटाई जा चुकी मनरेगा योजना के तहत 20 लाख से अधिक परिवार पंजीकृत थे, जिनमें बड़ी संख्या खेतिहर मजदूरों, दलितों, महिलाओं और सीमांत किसानों की थी। योजना के कमजोर पड़ने या बंद होने से इन परिवारों की आर्थिक रीढ़ टूट गई है, और गांवों में बेरोज़गारी, पलायन और कर्ज़ का संकट गहराता जा रहा है।
इस आंदोलन की औपचारिक शुरुआत पंजाब कांग्रेस प्रभारी भूपेश बघेल करेंगे। 5 जनवरी को वे अमृतसर से अभियान का शंखनाद करेंगे। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह सिर्फ एक राजनीतिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि ग्रामीण पंजाब के हक़ की लड़ाई है, जिसे हर गांव और हर पंचायत तक ले जाया जाएगा।
कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि यह विरोध प्रदर्शन गुरदासपुर, होशियारपुर, नवांशहर, समराला, राजपुरा, संगरूर समेत उन सभी ग्रामीण इलाकों में आयोजित किए जाएंगे, जहां मनरेगा लाभार्थियों की संख्या सबसे अधिक रही है। पार्टी का दावा है कि इन क्षेत्रों में मनरेगा के ठप होने का असर सबसे ज़्यादा दिख रहा है—काम की कमी, मजदूरी का संकट और परिवारों की रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी न हो पाना।
पार्टी नेताओं का आरोप है कि सरकार की नीतियों और इच्छाशक्ति की कमी के चलते मनरेगा जैसी जनकल्याणकारी योजना को जानबूझकर कमजोर किया गया, जबकि यह योजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संभालने की सबसे बड़ी ढाल थी। कांग्रेस का कहना है कि जब महंगाई और बेरोज़गारी दोनों चरम पर हों, तब मनरेगा को नजरअंदाज करना गरीबों के साथ सीधा अन्याय है।
कांग्रेस ने यह भी साफ किया है कि यदि सरकार ने मनरेगा को पूरी तरह बहाल करने, काम के दिन बढ़ाने और समय पर भुगतान सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह आंदोलन और तेज़ किया जाएगा।
पंजाब की राजनीति में यह आंदोलन ऐसे समय शुरू हो रहा है, जब ग्रामीण असंतोष लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में मनरेगा को लेकर कांग्रेस का यह कदम न सिर्फ सरकार के लिए चुनौती है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या ग्रामीण गरीब की आवाज़ एक बार फिर सड़कों पर ही सुनी जाएगी?




