महेंद्र कुमार | नई दिल्ली 6 जनवरी 2026
UAPA (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) के एक मामले में उमर खालिद की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा रुख को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस तेज़ हो गई है। कांग्रेस वर्किंग कमेटी के स्थायी आमंत्रित सदस्य और वरिष्ठ नेता गुरदीप सिंह सप्पल ने इस फैसले पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए न्याय प्रक्रिया की दिशा और मंशा पर चिंता जताई है। गुरदीप सिंह सप्पल ने सोशल मीडिया पर किए गए अपने पोस्ट में पूछा कि “बिना ट्रायल के किसी व्यक्ति को कितने लंबे समय तक जेल में रखा जा सकता है?” उन्होंने कहा कि उमर खालिद को पांच साल जेल में रखने के बाद अदालत द्वारा यह कहना कि उन्हें “एक साल और” जेल में रहना होगा, कई अहम सवालों को जन्म देता है।
उन्होंने स्पष्ट तौर पर सवाल उठाया कि यह एक साल की समय-सीमा किस आधार पर तय की गई है। क्या यह फैसला किसी ठोस कानूनी प्रावधान पर आधारित है या फिर यह पूरी तरह मनमाना (arbitrary) है? सप्पल ने यह भी पूछा कि क्या UAPA जैसे मामलों में अदालत का स्वाभाविक झुकाव जांच एजेंसी या राज्य के पक्ष में होना चाहिए, या फिर अदालत को दोनों पक्षों के बीच समान दूरी बनाए रखनी चाहिए।
कांग्रेस नेता ने कहा कि अदालत का मूल कर्तव्य न्याय करना है, न कि किसी एक पक्ष का समर्थन करना। न्यायिक प्रक्रिया का अर्थ यही है कि कोर्ट यह तय करे कि सही कौन है—जांच एजेंसी/राज्य या फिर आरोपी पक्ष। यदि अदालत पहले से ही किसी एक तरफ झुकी हुई नज़र आए, तो यह न्याय की राह में गंभीर रुकावट बन जाता है।
गुरदीप सिंह सप्पल ने जोर देकर कहा कि नागरिक (citizen) और राज्य (state)—सिद्धांत रूप से अदालत के लिए दोनों बराबर होने चाहिए। चाहे मामला UAPA का हो, राष्ट्रीय सुरक्षा का हो या किसी व्यक्ति विशेष का, अदालत की निष्पक्षता और तटस्थता बनी रहनी चाहिए।
उन्होंने अंत में चेतावनी भरे लहजे में कहा कि न्यायपालिका से जुड़ी यह बुनियादी अवधारणा अब कमजोर होती दिखाई दे रही है, और यही बात सबसे बड़ी चिंता का विषय है। इस बयान के बाद UAPA कानून, लंबी न्यायिक हिरासत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर बहस एक बार फिर तेज़ हो गई है।




