एबीसी डेस्क 17 दिसंबर 2025
केंद्रीय मंत्री का संदेश— खेती के लिए ज्यादा नहीं, सही पानी जरूरी
राजधानी दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में आयोजित किसान इंडिया के एक दिवसीय कार्यक्रम ‘अन्नपूर्णा 2025’ में खेती, जल प्रबंधन, सहकारिता, डेयरी और कृषि नीतियों को लेकर व्यापक चर्चा हुई। कार्यक्रम में किसानों, किसान नेताओं, नीति विशेषज्ञों, अधिकारियों और कृषि से जुड़े उद्यमियों ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया। मंच से एक स्वर में यह बात उभरी कि खेती का भविष्य सिर्फ ज्यादा संसाधनों में नहीं, बल्कि सही और वैज्ञानिक उपयोग में है।
कार्यक्रम में अपने संदेश में केंद्रीय जलशक्ति मंत्री राज भूषण चौधरी ने कहा कि आज देश में खेती के लिए “ज्यादा पानी नहीं, बल्कि सही पानी” की जरूरत है। उन्होंने कहा कि भारत सरकार इसी सोच के तहत ‘पर ड्रॉप, मोर क्रॉप’ जैसी योजनाएं चला रही है, जो न सिर्फ किसानों के लिए फायदेमंद हैं, बल्कि जल संरक्षण के लिहाज से भी बेहद अहम हैं। चौधरी ने कहा कि खेती में जलशक्ति मंत्रालय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि पानी ही खेती की रीढ़ है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 11 वर्षों के कार्यकाल का जिक्र करते हुए कहा कि घर-घर नल से जल पहुंचाने, जल संचय और जल प्रबंधन को लेकर जो काम हुए हैं, वे आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहद जरूरी हैं, खासकर जलवायु परिवर्तन के दौर में।
कार्यक्रम में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के संयुक्त सचिव के.के. त्रिपाठी ने कृषि संरचना में हो रहे बदलावों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि देश में खेती की जोत लगातार छोटी होती जा रही है और बड़ी संख्या में सीमांत किसान मजदूर बनने को मजबूर हो रहे हैं। ऐसे में किसानों के लिए जरूरी है कि वे परंपरागत खेती के साथ-साथ बागवानी और वैज्ञानिक पद्धति से जुड़ी फसलों की ओर बढ़ें। उन्होंने बताया कि इसके लिए पैक्स (PACS) और सहकारिता सोसायटी किसानों के लिए मजबूत सहारा बन सकती हैं और इससे किसानों को बाजार, पूंजी और तकनीक तक बेहतर पहुंच मिल रही है।
को-ऑपरेटिव की भूमिका पर बोलते हुए पूर्व सांसद और किसान नेता राजू शेट्टी ने कहा कि मौजूदा हालात में केवल आंदोलन के रास्ते से किसानों की समस्याओं का समाधान संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि किसानों को अब सहकारिता का रास्ता अपनाना होगा। शेट्टी ने सरकार पर यह भी आरोप लगाया कि सहकारिता क्षेत्र में किसानों की भागीदारी अभी उतनी मजबूत नहीं है, जितनी होनी चाहिए, और इस दिशा में सरकार को और गंभीरता से काम करने की जरूरत है।
कार्यक्रम के दौरान तीन कृषि कानूनों को लेकर भी तीखी बहस देखने को मिली। ये वही कानून हैं, जिन्हें लागू करने के बाद केंद्र सरकार को वापस लेना पड़ा था। भारतीय किसान यूनियन (मान) के हरियाणा अध्यक्ष गुणी प्रकाश ने इन कानूनों का समर्थन करते हुए कहा कि ये कानून छोटे और सीमांत किसानों के हित में थे और इससे किसानों को अपनी उपज का बेहतर दाम मिल सकता था।
वहीं इस पर राष्ट्रीय किसान मजदूर पार्टी के संस्थापक और उत्तर प्रदेश के प्रमुख किसान नेता वी.एम. सिंह ने कड़ा विरोध जताया। वी.एम. सिंह ने कहा कि ये कानून किसानों के हित में नहीं थे और न ही केंद्र व राज्य सरकारें वास्तव में किसानों की चिंता कर रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार किसानों को केवल वोट बैंक के रूप में देखती है और मजबूरी में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीद करती है।
कार्यक्रम में डेयरी सेक्टर पर भी विशेष चर्चा हुई। इस सत्र में आनंदा डेयरी के चेयरमैन आर.एस. दीक्षित, बालिनी ग्रुप के सीईओ ओ.पी. सिंह और युवा डेयरी किसान दुष्यंत भाटी शामिल हुए। आर.एस. दीक्षित ने कहा कि जब तक ब्रीडिंग तकनीक को ज्यादा से ज्यादा किसानों तक नहीं पहुंचाया जाएगा, तब तक गोधन की नस्ल सुधार की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकती। वहीं ओ.पी. सिंह ने कहा कि गांव और किसानों का भरोसा जीते बिना कोई भी स्टार्टअप सफल नहीं हो सकता, और बालिनी मिल्क प्रोड्यूसर कंपनी इसका जीवंत उदाहरण है।
डेयरी उद्योग से जुड़े वक्ताओं ने कहा कि यह सेक्टर सरकार और किसानों—दोनों के साथ मिलकर आगे बढ़ने को तैयार है, लेकिन किसानों को भी नई तकनीक और आधुनिक सोच के साथ खुद को तैयार करना होगा।
प्रोग्रेसिव किसानों में डी.पी. सिंह और मंजू रानी कश्यप ने अपने अनुभव साझा किए। मंजू रानी कश्यप ने कहा कि एकीकृत खेती के जरिए किसान और खासकर महिलाएं ज्यादा लाभ कमा सकती हैं। उन्होंने सिंघाड़े की खेती और मछलीपालन से जुड़े अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि किसान सरकारी सब्सिडी योजनाओं, केवीके (कृषि विज्ञान केंद्र) के वैज्ञानिकों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों का भरपूर लाभ उठाकर अपनी आय बढ़ा सकते हैं।
कार्यक्रम में किसान नेता धर्मेंद्र मलिक सहित कई अन्य वक्ताओं ने भी हिस्सा लिया। कुल मिलाकर, अन्नपूर्णा 2025 एक ऐसा मंच साबित हुआ जहां पानी, खेती, सहकारिता, डेयरी और कृषि नीति—सभी मुद्दों पर खुलकर चर्चा हुई और यह संदेश साफ निकला कि खेती का भविष्य सामूहिक प्रयास, सही नीति और वैज्ञानिक सोच में ही सुरक्षित है।





