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कश्मीर की धड़कन: मक्का और दलहन की खेती, पोषण और आत्मनिर्भरता की नई कहानी

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कश्मीर की अर्थव्यवस्था और जीवनशैली में जहां सेब, चावल और केसर जैसे उत्पादों की चर्चा अधिक होती है, वहीं घाटी के असली पोषण-आधारित फसलों में मक्का (Maize) और दलहन (Pulses) की भी उतनी ही अहम भूमिका है। ये दोनों फसलें न केवल खाद्य सुरक्षा का आधार हैं, बल्कि गरीब और सीमांत किसानों की जीविका, पर्वतीय क्षेत्रों में खेती की निरंतरता, और स्वदेशी कृषि परंपरा का प्रतीक भी हैं। बदलते जलवायु परिदृश्य और पोषण संकट के समय में, अब मक्का और दलहन की खेती को घाटी में पुनः प्राथमिकता दी जा रही है — जिससे कश्मीर न केवल उत्पादन में आत्मनिर्भर बने, बल्कि पोषण और स्वास्थ्य में भी सशक्त बन सके।

कश्मीर में मक्का की खेती: ऊँचाई में उगती आशा

कश्मीर में मक्का की खेती दक्षिण और मध्य कश्मीर के जिलों जैसे अनंतनाग, शोपियां, पुलवामा, बडगाम, गांदरबल, बारामुला और कुपवाड़ा में की जाती है। घाटी की ढलानदार ज़मीन, ठंडी जलवायु और कम सिंचाई संसाधनों के बीच मक्का एक आदर्श फसल साबित होती है। इसके बीज जून के आसपास बोए जाते हैं और सितंबर-अक्टूबर तक कटाई की जाती है। कई क्षेत्रों में यह खरीफ की प्रमुख फसल है, और चावल के साथ रोटेशन में भी उगाई जाती है।

कश्मीर में उगाई जाने वाली मक्के की किस्मों में ‘Shalimar Maize Composite’, ‘Shalimar Maize Hybrid’, और ‘C-6’ प्रमुख हैं, जिन्हें SKUAST-K (Sher-e-Kashmir University of Agricultural Sciences & Technology) द्वारा विकसित किया गया है। ये किस्में अल्पकालिक, उच्च उत्पादक, और रोग प्रतिरोधक हैं। मक्के के दानों का उपयोग इंसानी खपत, पशु आहार, आटा, पोल्ट्री फीड और यहां तक कि इथेनॉल उत्पादन में भी किया जाता है।

दलहन (Pulses) की खेती: पोषण से परंपरा तक

कश्मीर में दलहनों की खेती का इतिहास उतना ही पुराना है जितना यहां की सभ्यता। राजमाश (Kidney Beans), मूंग, उड़द, मसूर, चना और मटर जैसी फसलें आज भी घाटी के ऊँचाई वाले क्षेत्रों में छोटे किसानों के लिए आजीविका का प्रमुख स्रोत हैं। विशेषकर राजौरी, पुंछ, उधमपुर, बांदीपोरा और डोडा में दलहन की खेती व्यापक रूप से की जाती है।

राजमाश, जिसे स्थानीय भाषा में “बेयों” भी कहा जाता है, कश्मीर का एक पारंपरिक और स्वादिष्ट उत्पाद है, जिसकी मांग दिल्ली, पंजाब और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी खूब है। जैविक राजमाश को अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी ले जाने की योजना बनाई जा रही है।

दलहनों की खासियत यह है कि ये कम पानी में भी फलती-फूलती हैं, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखती हैं (नाइट्रोजन फिक्सेशन), और प्रोटीन का अच्छा स्रोत हैं। ये फसलें जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक सहिष्णु हैं, जिससे किसानों के लिए कम जोखिम वाली खेती साबित हो सकती है।

सरकारी पहल और वैज्ञानिक सहयोग:

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM) और PKVY (Paramparagat Krishi Vikas Yojana) जैसे केंद्र सरकार की योजनाएं मक्का और दलहन की खेती को बढ़ावा दे रही हैं। SKUAST-K के सहयोग से किसानों को बीज वितरण, उन्नत तकनीक, कीट नियंत्रण, और प्रशिक्षण की सुविधा दी जा रही है।

कई जगहों पर FPOs (Farmer Producer Organizations) के माध्यम से मक्का और दलहन की ब्रांडिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग की शुरुआत की गई है। इसके अलावा, महिला स्वयं सहायता समूह (SHGs) को प्रोसेसिंग यूनिट्स के ज़रिए घर बैठे रोजगार से भी जोड़ा जा रहा है।

बाज़ार, व्यापार और निर्यात की संभावना:

कश्मीर के मक्का और दलहन की मांग केवल घाटी तक सीमित नहीं है। जैविक मक्का, भुट्टा, मक्के का आटा और राजमाश की देशभर में अच्छी मांग है। विशेष रूप से राजमाश और मक्का आधारित स्नैक्स, जो अब स्वास्थ्य-प्रेमी युवाओं में लोकप्रिय हो रहे हैं, उनकी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर बिक्री भी शुरू हो चुकी है।

राजमाश, मसूर और मटर जैसी फसलों को उत्तर भारत के महानगरों, खासकर दिल्ली, चंडीगढ़, जयपुर, लखनऊ में होटल उद्योग में इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके अलावा, यदि निर्यात के लिए प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और प्रमाणीकरण को मजबूत किया जाए, तो ये उत्पाद मिडिल ईस्ट, यूरोप और कनाडा जैसे क्षेत्रों में अच्छा बाज़ार पा सकते हैं।

मुख्य चुनौतियाँ:

  1. बीज की गुणवत्ता और समय पर उपलब्धता
  1. प्रसंस्करण एवं भंडारण की कमी
  1. मौसम की अनिश्चितता (अचानक बर्फबारी या वर्षा)
  1. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की अनुपस्थिति
  1. किसानों में प्रशिक्षण और मार्केट एक्सेस की सीमाएं

समाधान और भविष्य की रणनीति:

  1. बेहतर बीज बैंक और बीज परीक्षण केंद्र स्थापित करना
  1. ब्लॉक-स्तर पर प्रोसेसिंग यूनिट्स और कोल्ड स्टोरेज का विकास
  1. GI टैग और ब्रांडिंग पर कार्य कर घाटी की विशिष्ट फसलों को राष्ट्रीय पहचान दिलाना
  1. दलहनों पर आधारित फूड स्टार्टअप्स, जैसे कि “कश्मीरी राजमाश कुकीज़”, “मक्का स्नैक्स” आदि
  1. फसल बीमा और MSP जैसी नीतियों को राज्य में लागू करना

कश्मीर में मक्का और दलहन की खेती केवल कृषि नहीं, बल्कि पोषण, परंपरा और आजीविका की त्रिवेणी है। यह फसलें घाटी के किसानों को क्लाइमेट-रेसिलिएंट विकल्प, स्वदेशी पोषण सुरक्षा, और स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ प्रदान करती हैं। अब ज़रूरत है कि नीति निर्माता, वैज्ञानिक संस्थान और सामाजिक संगठन मिलकर इन फसलों को व्यापक योजनाओं, प्रशिक्षण, बाज़ार संपर्क और नवाचार से जोड़ें — जिससे कश्मीर का मक्का और राजमाश भी सेब और केसर की तरह वैश्विक मानचित्र पर अपनी विशिष्ट जगह बना सके।

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